अरुणाचल प्रदेश पर चीन की नजर? 1914 से 2026 तक समझिए भारत-चीन सीमा विवाद की पूरी कहानी

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अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले में चीनी सैनिकों की 40 से 50 किलोमीटर तक घुसपैठ का दावा सामने आने के बाद सीमा सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने जांच की मांग की है, जबकि मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने घुसपैठ के दावे को खारिज किया है। आखिर अरुणाचल प्रदेश पर चीन अपना दावा क्यों करता है और 1914 से चला आ रहा सीमा विवाद अब तक क्यों नहीं सुलझा?

अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। अक्टूबर 2026 में अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बोसीराम सिरम ने आरोप लगाया कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने अपर सुबनसिरी जिले में भारतीय क्षेत्र के अंदर 40 से 50 किलोमीटर तक अपनी मौजूदगी बढ़ा ली है।

सिरम के मुताबिक, उनकी टीम ने अगस्त में सीमावर्ती इलाकों का दौरा किया था और स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान कई चिंताएं सामने आई थीं। उन्होंने इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।

हालांकि, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें ऐसी किसी घुसपैठ की जानकारी नहीं है और उन्हें नहीं लगता कि इस तरह की घटना हुई है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वास्तव में चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में इतनी दूर तक पहुंच गए हैं? फिलहाल 40 से 50 किलोमीटर तक घुसपैठ के दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। यहां यह समझना भी जरूरी है कि किसी विवादित इलाके में गश्त को लेकर मतभेद, सैन्य मौजूदगी और किसी क्षेत्र पर वास्तविक कब्जा, तीन अलग-अलग स्थितियां हैं। हालांकि, सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय लोगों की शिकायतों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

1914 की मैकमोहन लाइन से शुरू हुआ सीमा विवाद

भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद की जड़ें साल 1914 तक जाती हैं। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। इसी साल ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों के बीच शिमला में बातचीत हुई थी।

इस बातचीत के दौरान ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन ने भारत और तिब्बत के बीच सीमा निर्धारित करने के लिए एक रेखा प्रस्तावित की। इसे आगे चलकर मैकमोहन लाइन कहा गया।

भारत इस सीमा रेखा को स्वीकार करता है और अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। वहीं चीन का कहना है कि 1914 का समझौता वैध नहीं था, क्योंकि उसके मुताबिक उस समय तिब्बत को स्वतंत्र रूप से ऐसा समझौता करने का अधिकार नहीं था। इसके बाद 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई। 1950 में चीनी सेना तिब्बत में दाखिल हुई और वहां चीन का नियंत्रण स्थापित होने लगा। इससे भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर तनाव बढ़ता गया।

अक्टूबर 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया। उस समय अरुणाचल प्रदेश को नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) कहा जाता था। पूर्वी क्षेत्र में चीनी सेना ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की और भारतीय सेना को कई मोर्चों पर कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। नवंबर 1962 में चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की और पूर्वी क्षेत्र से अपनी सेना पीछे हटा ली। हालांकि, पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चिन पर उसका नियंत्रण बना रहा। इस युद्ध के बाद भी अरुणाचल प्रदेश पर भारत का प्रशासन कायम रहा, लेकिन चीन ने इस क्षेत्र पर अपना दावा नहीं छोड़ा। 1987 में अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। इसके बावजूद चीन इस क्षेत्र को अपना हिस्सा बताता रहा है।

चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा क्यों करता है, LAC क्या है?

चीन अरुणाचल प्रदेश को अक्सर ‘दक्षिण तिब्बत’ यानी साउथ तिब्बत कहता है। वह विशेष रूप से तवांग जैसे इलाकों पर अपना दावा जताता है। तवांग बौद्ध धर्म और तिब्बती बौद्ध परंपरा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। भारत चीन के इन दावों को लगातार खारिज करता रहा है। भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश देश का अभिन्न हिस्सा है, जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चुनाव होते हैं और राज्य सरकार काम करती है। इस विवाद को समझने के लिए LAC यानी Line of Actual Control को जानना जरूरी है। इसे हिंदी में वास्तविक नियंत्रण रेखा कहा जाता है। यह वह रेखा है, जिसके आसपास भारत और चीन की सेनाएं अपनी-अपनी मौजूदगी बनाए रखती हैं।

हालांकि, दोनों देश इस बात पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि LAC वास्तव में कहां से गुजरती है। कई इलाकों में दोनों देशों के दावे एक-दूसरे से टकराते हैं। इसी वजह से सीमा पर गश्त के दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति पैदा होती रहती है।

सीमा विवाद केवल ऐतिहासिक दावों तक सीमित नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में सड़क, पुल और सैन्य बुनियादी ढांचे का विकास भी भारत और चीन के लिए महत्वपूर्ण है। बेहतर सड़क और कनेक्टिविटी से दुर्गम इलाकों में सैनिकों और जरूरी सामान को तेजी से पहुंचाया जा सकता है। यही वजह है कि दोनों देश सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं।

भारत और चीन ने सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए 1993, 1996 और 2005 में महत्वपूर्ण समझौते किए। इनका उद्देश्य सीमा विवाद का अंतिम समाधान होने तक वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास शांति और स्थिरता बनाए रखना था। लेकिन जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को एक बार फिर गंभीर तनाव में डाल दिया। इसके बाद सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के कई दौर हुए। 2026 में भी दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर बातचीत जारी है। अगस्त 2026 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक हुई। इसमें सीमा पर शांति बनाए रखने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने पर चर्चा हुई। हालांकि, बातचीत जारी रहने का मतलब यह नहीं है कि सीमा विवाद का स्थायी समाधान निकल गया है।

क्या चीन धीरे-धीरे भारतीय क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है?

अरुणाचल प्रदेश में 40 से 50 किलोमीटर तक चीनी घुसपैठ का दावा सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन धीरे-धीरे भारतीय क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है?

इस सवाल को समझने के लिए तीन पहलुओं को अलग-अलग देखना जरूरी है। पहला, अरुणाचल प्रदेश पर चीन का ऐतिहासिक दावा। दूसरा, सीमा के विवादित इलाकों में चीनी सैनिकों की गतिविधियां और बुनियादी ढांचे का विकास। तीसरा, भारतीय क्षेत्र पर वास्तविक कब्जा।

इन तीनों को एक ही घटना मानना सही नहीं होगा। चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है, यह लंबे समय से स्थापित तथ्य है। सीमा पर उसकी सैन्य गतिविधियों और बुनियादी ढांचे को लेकर भी भारत की सुरक्षा एजेंसियां सतर्क रहती हैं। लेकिन अपर सुबनसिरी में 40 से 50 किलोमीटर तक घुसपैठ के हालिया दावे को स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि के बिना सच नहीं माना जा सकता।

दूसरी तरफ, सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की शिकायतों को भी गंभीरता से लेने की जरूरत है। स्थानीय लोगों की आवाजाही, पारंपरिक रास्तों और भारतीय सेना की गश्त से जुड़े सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। इस पूरे विवाद से साफ है कि अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन के बीच तनाव की जड़ें एक सदी से भी पुरानी हैं। 1914 की मैकमोहन लाइन से शुरू हुआ विवाद 1962 के युद्ध, LAC पर मतभेद और मौजूदा सैन्य गतिविधियों तक पहुंच चुका है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों देश इस पुराने विवाद का स्थायी समाधान निकाल पाएंगे? क्योंकि सीमा केवल नक्शे पर खींची गई एक लकीर नहीं है। यह वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी, उनकी सुरक्षा, पहचान और देश की संप्रभुता से जुड़ा सवाल है।

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By Ahmad Samir