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डिग्री है लेकिन भविष्य कहाँ है?

शिक्षा बनाम रोजगार: क्या भारत अपने युवाओं से किया सबसे बड़ा वादा निभा पा रहा है?

भारत का सबसे बड़ा संकट बेरोज़गारी नहीं है।

भारत का सबसे बड़ा संकट है- उम्मीद और हक़ीक़त के बीच बढ़ती दूरी।

एक ओर करोड़ों परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई पर अपनी जीवनभर की कमाई खर्च कर रहे हैं।

दूसरी ओर, वही पढ़े-लिखे युवा डिग्री हाथ में लेकर नौकरी की कतार में खड़े हैं।

सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि रोज़गार कहाँ है।

सवाल यह भी है कि-

क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को उस दुनिया के लिए तैयार कर रही है, जहाँ उन्हें नौकरी मिलनी है?

भारत ने शिक्षा का विस्तार किया लेकिन क्या रोजगार भी उतनी ही तेज़ी से बढ़े?

पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा तक पहुँच ऐतिहासिक रूप से बढ़ी है।

विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी, कॉलेज बढ़े हैं, ग्रेजुएट्स बढ़े की संख्या बढ़ी है लेकिन Azim Premji University की State of Working India 2026 रिपोर्ट एक असहज सच्चाई सामने रखती है।

रिपोर्ट कहती है-

भारत में जितनी तेज़ी से ग्रेजुएट्स की संख्या बढ़ी है, उतनी तेज़ी से उनके लिए उपयुक्त रोजगार नहीं बढ़े।

यह सिर्फ़ एक आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक असंतोष की शुरुआत भी हो सकती है।

11 मिलियन बेरोज़गार ग्रेजुएट, आखिर यह संकेत किस ओर है?

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 6.3 करोड़ युवा ग्रेजुएट थे।

इनमें से लगभग 1.1 करोड़ (11 मिलियन) युवा बेरोज़गार थे।

यह आँकड़ा सिर्फ़ एक संख्या नहीं है बल्कि उन लाखों परिवारों की कहानी है जिन्होंने शिक्षा को भविष्य का टिकट समझा लेकिन मंज़िल अब भी दूर है।

समस्या सिर्फ़ नौकरी की नहीं, कौशल की भी है

अगर आज कंपनियों से पूछा जाए कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती क्या है तो उनका जवाब अक्सर होता है-

हमें डिग्री नहीं, योग्य उम्मीदवार चाहिए।”

यानी भारत में एक तरफ़ लाखों युवा नौकरी खोज रहे हैं।

दूसरी तरफ़ उद्योगों को प्रशिक्षित और सक्षम कार्यबल की कमी महसूस हो रही है।

यही वह Skill Mismatch है जिसकी ओर कई अध्ययन लगातार इशारा कर रहे हैं।

सरकार की तस्वीर क्या कहती है?

सरकारी Periodic Labour Force Survey (PLFS) के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कुल युवा बेरोज़गारी दर में कमी दर्ज की गई है।

यानी रोजगार बाज़ार में सुधार के संकेत मिले हैं।

लेकिन यही सरकारी आँकड़े यह भी दिखाते हैं कि उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी अब भी अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है।

यानी समस्या सिर्फ़ नौकरी की संख्या नहीं है।

समस्या है-

योग्य रोजगार (Quality Employment) की।

भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर और सबसे बड़ा जोखिम-

भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है।

अगले कुछ वर्षों तक हमारे पास सबसे बड़ी कार्यशील आबादी होगी।

अर्थशास्त्री इसे Demographic Dividend कहते हैं।

लेकिन इतिहास बताता है कि युवा आबादी तभी ताक़त बनती है, जब उसे शिक्षा के बाद सम्मानजनक रोजगार मिले।

वरना यही जनसांख्यिकीय लाभ सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती में बदल सकता है।

समाधान कहाँ है?

समाधान सिर्फ़ नई यूनिवर्सिटी खोलना नहीं है।

समाधान है-

  • उद्योगों की ज़रूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रम।
  • कौशल आधारित शिक्षा।
  • अप्रेंटिसशिप और इंटर्नशिप का विस्तार।
  • स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा रोजगार।
  • और ऐसी नीति जहाँ डिग्री का मूल्य बाज़ार की वास्तविक ज़रूरतों से जुड़ा हो।

निष्कर्ष

आज का भारतीय युवा दया नहीं माँग रहा।

वह आरक्षण की बहस भी नहीं कर रहा।

वह सिर्फ़ इतना पूछ रहा है-

अगर शिक्षा सफलता की पहली सीढ़ी है तो उस सीढ़ी के बाद दरवाज़ा क्यों बंद है?

क्योंकि जब एक समाज अपने युवाओं को शिक्षा तो देता है लेकिन अवसर नहीं तो समस्या सिर्फ़ बेरोज़गारी नहीं रहती।

वह विश्वास का संकट बन जाती है।

और शायद भारत को आने वाले वर्षों में सबसे अधिक इसी विश्वास की रक्षा करनी होगी।

Bhavishya
एक विचारशील लेखक, जो समाज की नब्ज को समझता है और उसी के आधार पर शब्दों को पंख देता है। लिखता है वो, केवल किताबों तक ही नहीं, बल्कि इंसानों की कहानियों, उनकी संघर्षों और उनकी उम्मीदों को भी। पढ़ना उसका जुनून है, क्योंकि उसे सिर्फ शब्दों का संसार ही नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगियों का हर पहलू भी समझने की इच्छा है।