सचिन पायलट को CM क्यों नहीं बनाया? अशोक गहलोत से बगावत और मुख्यमंत्री बनने की पूरी कहानी

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Sachin Pilot Political Journey: राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट एक ऐसा नाम हैं, जिन्हें लंबे समय से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देखा जाता रहा है। 2018 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगी, लेकिन बाजी अशोक गहलोत के हाथ लगी। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच मतभेद बढ़ते गए और जुलाई 2020 में कांग्रेस सरकार बड़े राजनीतिक संकट में फंस गई। आखिर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया गया? 2020 में उनकी बगावत के पीछे क्या वजह थी और अब उनके राजनीतिक भविष्य की क्या संभावनाएं हैं? आइए जानते हैं उनकी पूरी राजनीतिक कहानी।

सचिन पायलट का राजनीतिक सफर: पिता से मिली विरासत, खुद बनाई पहचान

सचिन पायलट का जन्म 7 सितंबर 1977 को हुआ था। उनके पिता राजेश पायलट कांग्रेस के बड़े नेताओं में शामिल थे और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे थे। राजनीतिक परिवार से आने के बावजूद सचिन पायलट ने अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की। उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई की और अमेरिका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने BBC और जनरल मोटर्स में काम किया।
साल 2004 में सचिन पायलट ने दौसा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। उस समय उनकी उम्र 26 साल थी। 2009 में उन्होंने अजमेर से लोकसभा चुनाव जीता और बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। उनके सामने राज्य में कमजोर हो चुकी कांग्रेस को फिर से मजबूत करने की चुनौती थी। सचिन पायलट ने संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने पर काम किया।

2018 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत क्यों बने?

साल 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने राजस्थान में बड़ी जीत दर्ज की थी और वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनी थीं। पांच साल बाद, 2018 में कांग्रेस ने वापसी की। पार्टी ने 200 में से 99 सीटें जीतीं और सहयोगियों व निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई। उस समय सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। उनके समर्थकों का मानना था कि चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने और कांग्रेस की वापसी में उनकी अहम भूमिका रही थी। इसलिए मुख्यमंत्री पद पर उनका दावा मजबूत माना जा रहा था।
लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने अनुभवी नेता अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया।

इसके पीछे पार्टी के सामने कई राजनीतिक समीकरण थे। अशोक गहलोत का लंबा प्रशासनिक अनुभव, विधायकों के बीच उनकी पकड़ और पार्टी संगठन में उनका प्रभाव अहम माना गया। हालांकि मुख्यमंत्री चुनने के फैसले के पीछे हाईकमान की पूरी आंतरिक चर्चा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हुई। सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली, लेकिन सत्ता में उनकी भूमिका और मुख्यमंत्री पद को लेकर उम्मीदें आगे भी चर्चा का विषय बनी रहीं।

2020 में सचिन पायलट की बगावत की असली वजह क्या थी?

जुलाई 2020 में राजस्थान कांग्रेस का अंदरूनी संघर्ष खुलकर सामने आ गया। सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली और हरियाणा में रहे। इस घटनाक्रम से अशोक गहलोत सरकार पर बहुमत का संकट पैदा हो गया। गहलोत ने बीजेपी पर उनकी सरकार गिराने की कोशिश करने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, पायलट खेमे की तरफ से नेतृत्व, सम्मान और सरकार में उचित भूमिका जैसे मुद्दे उठाए गए। दोनों नेताओं के बीच मतभेदों को केवल मुख्यमंत्री पद की लड़ाई तक सीमित करना सही नहीं होगा, क्योंकि इसके पीछे संगठन और सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल भी थे।
14 जुलाई 2020 को कांग्रेस ने सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दिया। उनके खेमे के दो मंत्रियों को भी पद से हटाया गया। हालांकि, सचिन पायलट ने कांग्रेस नहीं छोड़ी। अगस्त 2020 में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद पार्टी के भीतर बातचीत का रास्ता खुला। 14 अगस्त को अशोक गहलोत सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया और अपनी सरकार बचा ली। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रहीं। पायलट के समर्थकों ने इसे नेतृत्व और सम्मान की लड़ाई बताया, जबकि आलोचकों ने इसे सत्ता की महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखा।

2023 का चुनाव और सचिन पायलट का अगला कदम

2020 के राजनीतिक संकट के बाद भी सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच मतभेदों की चर्चा खत्म नहीं हुई। अप्रैल 2023 में पायलट ने पिछली वसुंधरा राजे सरकार के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई की मांग करते हुए जयपुर में अनशन किया। इसे गहलोत सरकार पर उनके दबाव के तौर पर देखा गया।
2023 के विधानसभा चुनाव में सचिन पायलट टोंक सीट से जीते, लेकिन कांग्रेस राजस्थान की सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। बीजेपी ने सरकार बनाई और भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद सचिन पायलट की राजनीति में चुनौती बदल गई। अब सवाल सिर्फ कांग्रेस सरकार में उनकी भूमिका का नहीं, बल्कि विपक्ष में रहते हुए पार्टी को मजबूत करने और अगले चुनाव की तैयारी का भी है।

सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने की कितनी संभावना है?

सचिन पायलट के पास सांसद, केंद्रीय मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री के तौर पर काम करने का अनुभव है। राजस्थान में उनका राजनीतिक आधार भी है। लेकिन मुख्यमंत्री बनना सिर्फ लोकप्रियता या समर्थकों की संख्या पर निर्भर नहीं करता।
इसके लिए विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन, विधायकों का समर्थन, संगठन के भीतर संतुलन और कांग्रेस हाईकमान का फैसला अहम होगा। पायलट के सामने राजस्थान कांग्रेस में अलग-अलग गुटों के बीच तालमेल बनाए रखने और जनता के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की चुनौती है।
उनकी आगे की भूमिका इस बात पर भी निर्भर करेगी कि कांग्रेस उन्हें संगठन में कितनी बड़ी जिम्मेदारी देती है और राजस्थान की राजनीति में उनके लिए क्या अवसर बनते हैं।
सचिन पायलट की राजनीतिक कहानी कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, सत्ता में हिस्सेदारी और महत्वाकांक्षा की जटिल राजनीति को दिखाती है। 2018 में मुख्यमंत्री पद से चूकने के बाद 2020 में उनका टकराव खुलकर सामने आया, लेकिन उन्होंने कांग्रेस छोड़ने के बजाय पार्टी के भीतर रहकर अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखी।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सचिन पायलट को भविष्य में राजस्थान की कमान मिल पाएगी? इसका जवाब आने वाले चुनावों, पार्टी के फैसलों और राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों से ही मिलेगा।

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By Ahmad Samir