लखनऊ: उत्तर प्रदेश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) प्रणाली खुद ही सड़ने की कगार पर है, और यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि हकीकत है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की ताज़ा ऑडिट रिपोर्ट ने योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले कार्यकाल में वित्तीय अनियमितताओं, नियमों के खुलेआम उल्लंघन और जानबूझकर की गई देरी का गंभीर पर्दाफाश किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन जैसी केंद्र और राज्य सरकार की प्रमुख योजनाएं धरातल पर विफल साबित हुईं, जबकि कागज़ों में करोड़ों रुपये खर्च किए गए।
मुख्य खुलासे:
योजनाएं बनी ही नहीं, पद खाली पड़े रहे
- 2014 से 2022 के बीच 45 नगर निकायों का ऑडिट किया गया, जिनमें से केवल 3 निकायों ने ही अपशिष्ट प्रबंधन योजना बनाई थी।
- 50% से अधिक स्वच्छता निरीक्षक पद खाली थे।
कलेक्शन और भुगतान में भारी गड़बड़ी
- गाज़ियाबाद और लखनऊ नगर निकाय 71 करोड़ रुपये का संग्रह करने में विफल रहे।
- हाथरस में एक कंपनी को 30.32 लाख रुपये अतिरिक्त भुगतान किया गया।
- लोनी नगर पालिका, गाज़ियाबाद ने कृत्रिम रूप से कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर ठेकेदार को 3.68 करोड़ रुपये अतिरिक्त दिलवाए।
बिना काम के भुगतान
- लखनऊ का शिवरी अपशिष्ट संयंत्र 409 दिनों तक बंद रहा (2019–2020 के बीच), फिर भी निजी कंपनी M/s Ecogreen Energy Pvt Ltd को 5.28 करोड़ रुपये भुगतान किया गया।
- भुगतान फर्जी बिलों और अपशिष्ट मात्रा में बढ़ा-चढ़ाकर किया गया, जिसके लिए CAG ने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश की है।
कुंभ 2019 में भी भारी घोटाला
- प्रयागराज कुंभ (2019) में, M/s Hari Bhari Recycling Pvt Ltd को बिना किसी औपचारिक अनुबंध के 95.28 लाख रुपये का भुगतान किया गया।
- 10,000 टन “पुराना कचरा” हटाने के नाम पर ये रकम दी गई, लेकिन कोई लेखा-जोखा नहीं मिला।
- ₹15 लाख का ‘उधार’ (loan) जो उर्वरक पैकेजिंग के लिए दिया गया था, चुपचाप माफ कर दिया गया, और एक भी पैसा वसूल नहीं हुआ।
बजट बढ़ा, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं बदला
- 2016-17 में बजट ₹74.49 करोड़ था, जो 2021-22 में ₹1,650.67 करोड़ तक पहुंच गया।
- लेकिन रिपोर्ट कहती है कि ये पैसा धरातल तक पहुंचा ही नहीं।
- फंड जारी करने में 2 महीने से लेकर 3 साल तक की देरी की गई, जिससे परियोजनाएं ठप हो गईं और कूड़ा बिना लाइसेंस वाले खुले ट्रकों में सड़ता रहा।
अधोसंरचना की हालत दयनीय
- 90% नगर निकायों के पास कचरे को तौलने के लिए वेटब्रिज (weighbridges) नहीं थे।
- 32 में से केवल 15 प्रोसेसिंग प्लांट ही चालू हैं।
CAG की चेतावनी
CAG ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर जिला से लेकर राज्य स्तर तक कड़ी निगरानी, समय पर फंड रिलीज, और सभी प्लांट्स को सक्रिय नहीं किया गया, तो स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाएं सिर्फ प्रेस रिलीज तक ही सीमित रह जाएंगी।
उत्तर प्रदेश की सड़कों और गलियों में फैला कचरा अब सिर्फ दुर्गंध नहीं, बल्कि प्रशासनिक बदबू बन गया है। CAG की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में नीतिगत विफलता, भ्रष्टाचार और गैरजवाबदेही की गहरी जड़ें हैं।
अब सवाल है — क्या योगी सरकार इस पर कठोर कार्रवाई करेगी या रिपोर्ट भी बाकी फाइलों की तरह धूल खाती रह जाएगी? जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए जवाबदेही तय करना अब जरूरी हो गया है।