नई दिल्ली: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला ब्रह्मकमल न केवल राज्य का राजकीय पुष्प है, बल्कि भारतीय संस्कृति और पौराणिक मान्यताओं में इसे दिव्य और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यह फूल हर साल जुलाई से सितंबर के बीच ही खिलता है और बेहद अल्प समय में मुरझा भी जाता है। इसकी दुर्लभता, दिव्यता और रहस्यमयी प्रकृति इसे विशेष बनाती है।
कैसा होता है ब्रह्मकमल?
ब्रह्मकमल सफेद रंग का कमलनुमा फूल होता है जो ऊंचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में खिलता है। यह देखने में जितना सुंदर होता है, उतना ही पौराणिक महत्व भी रखता है। माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मकमल से हुई थी, और यह ब्रह्मा जी का प्रिय पुष्प है। उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की पूजा में विशेष रूप से ब्रह्मकमल अर्पित किया जाता है।
घर में ब्रह्मकमल लगाने के लाभ
ज्योतिष और वास्तु शास्त्रों के अनुसार, यदि ब्रह्मकमल घर में लगाया जाए, तो यह कई सकारात्मक प्रभाव लाता है:
- घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है
- सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है
- मानसिक शांति, प्रेम और सौंदर्य बढ़ता है
- शनि, राहु-केतु जैसे ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं
- जब यह फूल घर में खिलता है, तो माना जाता है कि मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है
कहां लगाएं ब्रह्मकमल?
वास्तु शास्त्र के अनुसार, ब्रह्मकमल को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में लगाना अत्यंत शुभ होता है। यदि इसे मंदिर या पूजा घर के पास लगाया जाए, तो इसके प्रभाव और भी शुभ फलदायी होते हैं। इसकी सुगंध और ऊर्जा वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बना देती है।
ब्रह्मकमल से जुड़ी पौराणिक कथाएं
- एक कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ध्यान में लीन होकर सो गए, तो जागने पर उन्होंने स्वयं को एक कमल के रूप में पाया। तभी से इस पुष्प को ब्रह्मकमल कहा गया।
- एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपनी पत्नी लक्ष्मी को पुनर्जीवित करने के लिए इस फूल का प्रयोग किया था।
- कुछ मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति भी ब्रह्मकमल से ही हुई थी, और यही कारण है कि यह फूल ब्रह्मा जी को अत्यंत प्रिय है।
ब्रह्मकमल न केवल एक दुर्लभ और सुंदर पुष्प है, बल्कि यह आस्था, आध्यात्म और ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है। इसकी झलक पाने को लोग तरसते हैं और जो इसे खिलते हुए देख ले, उसकी किस्मत बदलने की मान्यता भी है। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसकी पुष्टि नहीं हुई है, पर भारतीय संस्कृति में इसकी जगह अद्वितीय है।
(Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।)