हरतालिका तीज व्रत का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं और कुवांरी कन्याओं द्वारा रखा जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां इस दिन व्रत कर मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं।
हरतालिका तीज: धार्मिक महत्व
पुराणों के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उन्होंने तपस्या के दौरान मिट्टी से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी। उनकी भक्ति और निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। तभी से इस व्रत पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजा करने की परंपरा प्रचलित है।
हरतालिका तीज की पूजा विधि
हरतालिका तीज के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, विशेषकर हरे या लाल रंग के कपड़े शुभ माने जाते हैं।
- पूजा स्थल पर चौकी पर लाल या हरे रंग का कपड़ा बिछाएं।
- मिट्टी से शिव और पार्वती की मूर्ति तथा शिवलिंग बनाकर स्थापित करें।
- सर्वप्रथम भगवान गणेश की पूजा करें।
- फिर माता पार्वती और भगवान शिव की विधिवत पूजा करें।
- माता को सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
- व्रत कथा का श्रवण करें और अंत में आरती करके प्रसाद वितरण करें।
माता पार्वती का शृंगार कैसे करें?
हरतालिका तीज की पूजा में मां गौरी के सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व होता है।
- सर्वप्रथम सिंदूर अर्पित करें, इसके बाद काजल लगाएं।
- मां को लाल चुनरी ओढ़ाएं और चूड़ियां पहनाएं।
- महावर (पैरों की सजावट) अर्पित करें।
- इसके अलावा बिछिया, मेहंदी, बिंदी, अंगूठी, नथ, हार, गजरा आदि श्रृंगार सामग्री अर्पित करें।
क्यों है ये व्रत खास?
हरतालिका तीज न केवल स्त्री-सामर्थ्य और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह व्रत एक महिला की आस्था, प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और मां पार्वती से अपने वैवाहिक जीवन में सौभाग्य की कामना करती हैं।
इस वर्ष हरतालिका तीज का पर्व 1 सितंबर 2025, सोमवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से जुड़ा यह पर्व भक्ति और श्रद्धा का अनूठा उदाहरण है। माता पार्वती के इस व्रत से हर स्त्री को अपने जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति हो — यही भावना इस पर्व की आत्मा है।
(नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है।)