नई दिल्ली: देश के अगले उपराष्ट्रपति पद के लिए नामांकन के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। एक ओर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने सी.पी. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है, तो दूसरी ओर विपक्ष ने सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी को मैदान में उतारा है। दोनों ही व्यक्तित्वों को ‘शालीन, मिलनसार और सादगीपूर्ण’ कहा जा रहा है, लेकिन जहां तक राजनीतिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक अनुभव की बात है, दोनों में गहरी भिन्नता है।
सी.पी. राधाकृष्णन: पूरी तरह आरएसएस से जुड़े
एनडीए के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन आरएसएस से 16 वर्ष की उम्र से जुड़े हुए हैं। उन्हें ‘100 प्रतिशत आरएसएस’ वाला और ‘लो-की’ नेता बताया जाता है। उनका सार्वजनिक जीवन तमिलनाडु से दो बार लोकसभा सांसद रहने, झारखंड और महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में सेवा देने तक फैला है। उपराष्ट्रपति पद के लिए नामित किए जाने के तुरंत बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा समेत पूरे एनडीए नेतृत्व को ‘प्रिय और माननीय’ कहकर आभार व्यक्त किया।
उनकी इस भाषा से राजनीतिक विश्लेषक उन्हें ‘अनुगामी और आज्ञाकारी’ मान रहे हैं। हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि यह विनम्रता राज्यसभा के विपक्षी सदस्यों के प्रति भी बनी रहती है या नहीं।
जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी: संविधान के संरक्षक के रूप में अनुभव
विपक्ष के उम्मीदवार जस्टिस (सेवानिवृत्त) बी. सुदर्शन रेड्डी ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट से सेवा निवृत्ति के बाद भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई है। हाल ही में उन्होंने तेलंगाना सरकार द्वारा कराए गए जातीय सर्वेक्षण पर विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल में कई संवैधानिक मामलों की सुनवाई की थी।
उनका सबसे महत्वपूर्ण फैसला साल 2011 में आया, जब उन्होंने नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में सलवा जुडूम जैसी निजी सशस्त्र मिलिशिया को प्रतिबंधित किया। इसके अलावा उन्होंने विदेशी बैंकों में जमा काले धन को ‘राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की लूट’ करार देते हुए सरकार की आलोचना की थी।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें गोवा का पहला लोकायुक्त नियुक्त किया गया था, हालांकि उन्होंने सात महीने में ही इस्तीफा दे दिया। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कर्नाटक में खनन से प्रभावित इलाकों के पुनर्वास कार्यक्रम की निगरानी के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया।
उपराष्ट्रपति पद के लिए कौन उपयुक्त?
जहां राधाकृष्णन की योग्यता राजनीतिक निष्ठा और आरएसएस से जुड़ाव के रूप में देखी जा रही है, वहीं न्यायमूर्ति रेड्डी का नाम संवैधानिक मूल्यों, निष्पक्षता और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर सामने आया है।
न्यायमूर्ति रेड्डी ने नामांकन के बाद अपने वक्तव्य में कहा, “उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के रूप में यह जिम्मेदारी होती है कि वे संसदीय लोकतंत्र की सर्वोच्च परंपराओं की रक्षा करें। भारत की ताकत हर नागरिक की गरिमा, संवैधानिक नैतिकता और विविधता में एकता में निहित है।”
राजनीतिक समीकरण और निष्कर्ष
सवाल यह है कि क्या देश को एक और आरएसएस से जुड़ा संवैधानिक पदाधिकारी चाहिए, जब पहले से ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इस संगठन से जुड़े हुए हैं? क्या केवल राजनीतिक निष्ठा के आधार पर राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण सदन की अध्यक्षता किसी को सौंप दी जानी चाहिए?
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, जिन्होंने पिछले सत्र में प्रभावशाली ढंग से कार्य किया, उनको नजरअंदाज करना भी विचारणीय है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि केवल इसलिए कि हरिवंश ‘100 प्रतिशत आरएसएस’ नहीं हैं, उन्हें उपराष्ट्रपति पद के योग्य नहीं समझा गया।
जाहिर है, इस चुनाव में एक ओर आरएसएस की विचारधारा और सत्ता के प्रति निष्ठा है, तो दूसरी ओर संवैधानिक प्रतिबद्धता और न्यायिक अनुभव। अब यह निर्णय संसद के सांसदों को करना है कि कौन इस गरिमामयी पद के लिए अधिक उपयुक्त है।