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जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा: आखिर छह साल बाद भी अधूरा क्यों है यह वादा?

अगर किसी राज्य का अपना मुख्यमंत्री हो, अपनी विधानसभा हो, लेकिन एक दिन वह राज्य ही न रहे तो क्या होगा?

यही सवाल आज भी जम्मू-कश्मीर के साथ जुड़ा हुआ है।

2019 में अनुच्छेद 370 हटाया गया। राज्य का पुनर्गठन हुआ। और जम्मू-कश्मीर को एक पूर्ण राज्य से केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) में बदल दिया गया।

उस समय सरकार ने कहा था कि यह कदम बेहतर प्रशासन, तेज़ विकास और राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ज़रूरी है।

लेकिन छह साल बाद भी एक सवाल लगातार उठ रहा है-

आख़िर जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा कब मिलेगा?

क्या हुआ था 2019 में?

5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी किया और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू किया।

इसके तहत पुराने राज्य को दो हिस्सों में बाँटा गया-

  • जम्मू-कश्मीर (विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश)
  • लद्दाख (बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश)

यह भारत के संवैधानिक इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक बदलावों में से एक था।

सरकार क्या कहती है?

केंद्र सरकार लगातार यह कहती रही है कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढाँचे में सुधार हुआ है।

सरकार ने संसद और सर्वोच्च न्यायालय में भी यह कहा कि जम्मू-कश्मीर को उचित समय पर राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा, लेकिन पहले वहाँ सामान्य स्थिति और स्थिरता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

केंद्र का तर्क है कि सुरक्षा और प्रशासनिक परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाई जा रही है।

विपक्ष और स्थानीय दल क्या कहते हैं?

दूसरी ओर, कई राजनीतिक दलों और स्थानीय नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र की पूर्ण बहाली के लिए राज्य का दर्जा आवश्यक है।

उनका तर्क है कि-

  • चुनी हुई सरकार के अधिकार सीमित हैं।
  • कई महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय केंद्र के अधीन रहते हैं।
  • संघीय ढाँचे की भावना तभी पूरी होगी जब जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य बनाया जाएगा।

इसी मांग को लेकर समय-समय पर प्रदर्शन और राजनीतिक अभियान भी चलाए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

दिसंबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 से जुड़े फैसले पर अपना निर्णय सुनाया।

अदालत ने पुनर्गठन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही यह भी दर्ज किया कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने का आश्वासन दिया है और इसे यथाशीघ्र पूरा करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही गई थी।

अदालत ने विधानसभा चुनाव कराने पर भी बल दिया।

अब सबसे बड़ा सवाल-

अगर चुनाव हो चुके हैं, अगर विधानसभा मौजूद है, अगर जनप्रतिनिधि जनता के बीच हैं तो क्या अगला कदम पूर्ण राज्य का दर्जा होना चाहिए?

या केंद्र सरकार को अभी भी लगता है कि सुरक्षा और प्रशासनिक परिस्थितियाँ पूरी तरह अनुकूल नहीं हुई हैं?

यही वह प्रश्न है, जिस पर आज देशभर में बहस जारी है।

यह मुद्दा सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर का नहीं है

यह भारत के संघीय ढाँचे, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़ा प्रश्न भी है।

एक पक्ष मानता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

दूसरा पक्ष कहता है कि लोकतंत्र की मजबूती चुनी हुई राज्य सरकारों और पूर्ण संवैधानिक अधिकारों से आती है।

दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रखते हैं।

निष्कर्ष

जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है।

यह विश्वास, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा विषय है।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि-

क्या सरकार अपने पहले के आश्वासन के अनुरूप राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में अगला कदम उठाएगी?

या यह मुद्दा अभी और समय तक भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बहसों में शामिल रहेगा?

क्योंकि सवाल सिर्फ़ एक राज्य का नहीं बल्कि सवाल उस भरोसे का है, जो संविधान और लोकतंत्र दोनों की नींव है।

Bhavishya
एक विचारशील लेखक, जो समाज की नब्ज को समझता है और उसी के आधार पर शब्दों को पंख देता है। लिखता है वो, केवल किताबों तक ही नहीं, बल्कि इंसानों की कहानियों, उनकी संघर्षों और उनकी उम्मीदों को भी। पढ़ना उसका जुनून है, क्योंकि उसे सिर्फ शब्दों का संसार ही नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगियों का हर पहलू भी समझने की इच्छा है।