बिहार में बेटियों की सुरक्षा पर सवाल: जमुई की घटना से लेकर स्कूलों तक, क्या कहते हैं आंकड़े?
कभी कोचिंग से घर आते हुए अनजान लोगों से बचना, कभी स्कूल में शिक्षकों से बचना और कभी राह चलते लोगों से बचना… आखिर कब तक महिलाएं और बच्चियां खुद को हर किसी से बचाती रहेंगी? आखिर कब तक एक लड़की को अपने बारे में सोचने से पहले अपने आसपास के माहौल और समाज के बारे में सोचना पड़ेगा? सरकारों की ओर से लगातार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन बिहार से सामने आई हाल की कुछ घटनाओं ने महिला और बाल सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला सिर्फ अपराध होने का नहीं है, बल्कि घटना के बाद पुलिस कार्रवाई, प्रशासन की जवाबदेही और राजनीतिक बयानों को लेकर भी बहस तेज हुई है।
शुरुआत करते हैं बिहार के जमुई की उस घटना से, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा है। 19 सितंबर की शाम एक 10वीं कक्षा का लड़का और लड़की कोचिंग से लौट रहे थे। पुलिस के मुताबिक, रास्ते में कुछ युवकों ने दोनों को रोक लिया। इसके बाद लड़के के साथ मारपीट की गई और लड़की के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की गई। घटना का वीडियो भी बनाया गया, जिसमें लड़की लोगों से छोड़ देने की गुहार लगाती दिखाई देती है। बाद में यही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। पुलिस ने मामले में FIR दर्ज कर जांच शुरू की और POCSO समेत संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की। शुरुआती कार्रवाई में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और मामले की जांच के लिए SIT गठित की गई।
22 सितंबर को मामले में एक और बड़ा अपडेट सामने आया। पुलिस के मुताबिक, मुख्य आरोपी नंदन यादव को पकड़ने के दौरान मुठभेड़ हुई, जिसमें उसके पैर में गोली लगी और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस की ओर से बताया गया कि आरोपी को घटना स्थल पर ले जाकर जांच की प्रक्रिया के दौरान यह मुठभेड़ हुई। मामले में आगे की जांच जारी है।
इस मामले में पुलिस ने सिर्फ आरोपियों पर ही कार्रवाई नहीं की, बल्कि नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की है। बिहार पुलिस के मुताबिक करीब 120 सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर करने वाला वीडियो शेयर या दोबारा पोस्ट न करें, क्योंकि ऐसा करना कानून के तहत दंडनीय हो सकता है।
जमुई की घटना के बाद बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का एक पुराना बयान भी चर्चा में आ गया है। जब वह डिप्टी सीएम थे, तब एक कार्यक्रम में उन्होंने महिला सुरक्षा को लेकर कहा था कि अगर कोई व्यक्ति रात 12 बजे भी बाहर घूमे और उसे कोई छू दे तो वह सुबह इस्तीफा दे देंगे। इस पुराने बयान को अब विपक्षी नेताओं ने जमुई की घटना से जोड़ते हुए सरकार से सवाल किए हैं। RJD और कांग्रेस नेताओं ने बयान को सोशल मीडिया पर साझा किया और महिला सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए।
विपक्ष की ओर से इस मामले में सरकार पर राजनीतिक हमला किया गया है, जबकि सत्ता पक्ष की ओर से आरोपियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का हवाला दिया गया है। इस बीच JDU की ओर से घटना को अलग-थलग घटना बताते हुए प्रशासन की कार्रवाई की बात कही गई, जिस पर विपक्ष ने आपत्ति जताई। इस तरह जमुई की घटना अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रही, बल्कि महिला सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही को लेकर राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन गई है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या जमुई की घटना अकेली है? इसी बीच बिहार के बक्सर से भी छात्राओं की सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया। बिहार शिक्षा विभाग ने दो सरकारी स्कूल शिक्षकों को विभागीय जांच के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया। दोनों शिक्षकों पर छात्राओं के साथ यौन दुर्व्यवहार, आपत्तिजनक वीडियो से जुड़े आरोप और धमकी देने के आरोप थे। अधिकारियों के मुताबिक विभागीय जांच में आरोपों की पुष्टि हुई, जिसके बाद दोनों शिक्षकों को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए भी अयोग्य कर दिया गया।
यानी सवाल सिर्फ सड़कों पर महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा का नहीं है। सवाल स्कूल और शिक्षण संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा का भी है। जब एक बच्ची घर से स्कूल या कोचिंग के लिए निकलती है, तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उसके परिवार की नहीं हो सकती। सड़क से लेकर स्कूल और सार्वजनिक जगहों तक सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
अब बात करते हैं आंकड़ों की। क्योंकि कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे राज्य की स्थिति का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। NCRB के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 27,359 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2023 में यह संख्या 22,952 थी। यानी दर्ज मामलों की संख्या में करीब 19.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि 19.2 प्रतिशत का मतलब यह नहीं है कि बिहार की 19.2 प्रतिशत महिलाओं या लड़कियों के साथ बदसलूकी हुई। यह केवल दो वर्षों में दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि को दर्शाता है।
इसी तरह बच्चों के खिलाफ अपराध के आंकड़ों को भी अलग से समझना जरूरी है। 2024 में पूरे देश में बच्चों के खिलाफ 1,87,702 मामले दर्ज हुए, जिनमें 69,191 मामले POCSO Act के तहत दर्ज किए गए। यानी राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के खिलाफ दर्ज अपराधों में लगभग 36.9 प्रतिशत मामले POCSO से जुड़े थे। लेकिन यह पूरे भारत का आंकड़ा है, इसे बिहार में बच्चियों के साथ होने वाली घटनाओं का प्रतिशत नहीं कहा जा सकता।
अब असली सवाल यही है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जा रहा है? क्या संवेदनशील इलाकों में पर्याप्त पुलिस पेट्रोलिंग है? क्या स्कूल और कोचिंग से घर लौटने वाली बच्चियों के लिए रास्ते सुरक्षित हैं? क्या पीड़ित परिवार बिना किसी डर के तुरंत पुलिस तक पहुंच सकता है? और क्या सोशल मीडिया पर किसी नाबालिग से जुड़ा वीडियो वायरल होने से पहले उसे रोकने की व्यवस्था पर्याप्त है?
जमुई मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की, SIT बनाई, आरोपियों की गिरफ्तारी की और वीडियो के जरिए नाबालिग की पहचान उजागर करने वालों पर भी कार्रवाई शुरू की है। मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। अब आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया यह तय करेगी कि मामले में आरोपों का अंतिम निष्कर्ष क्या होता है।
लेकिन महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ घटना के बाद होने वाली गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। असली चुनौती ऐसी घटनाओं को होने से पहले रोकने की है। किसी लड़की के कपड़े, उसके दोस्त, उसका बाहर जाना या उसका किसी के साथ होना किसी भी व्यक्ति को उसे परेशान करने का अधिकार नहीं देता। इसी तरह किसी नाबालिग से जुड़ी घटना का वीडियो बनाना या उसकी पहचान उजागर करते हुए उसे सोशल मीडिया पर फैलाना भी गंभीर समस्या है।
बिहार की हाल की घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि बेटियों को सुरक्षित माहौल देने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? सरकारें और राजनीतिक दल महिला सुरक्षा को लेकर अपने-अपने दावे और बयान देते हैं, लेकिन जमीन पर सुरक्षा का अनुभव ही सबसे महत्वपूर्ण है। एक लड़की जब स्कूल जाए, कोचिंग जाए, कॉलेज जाए, काम पर जाए या शाम को घर लौटे, तो उसे सबसे पहले अपनी सुरक्षा को लेकर डरने के बजाय अपनी पढ़ाई, करियर और भविष्य के बारे में सोचने का अधिकार होना चाहिए।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान से जुड़ा सवाल है। जमुई से लेकर बक्सर तक सामने आए मामलों के बीच जरूरत इस बात की है कि कानून-व्यवस्था, पुलिसिंग, स्कूलों की निगरानी, तेज जांच और समाज की जिम्मेदारी—इन सभी स्तरों पर गंभीरता से काम किया जाए। आखिर बेटियों की सुरक्षा किसी एक राजनीतिक दल या सरकार का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।