नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा उपनाम होगा जिसने देश की सामाजिक संरचना और सत्ता समीकरणों को वैसा झटका दिया हो जैसा “मंडल” ने दिया। बी.पी. मंडल द्वारा अध्यक्षता की गई मंडल आयोग की सिफारिशों ने न केवल देश के पिछड़े वर्गों को अधिकार दिलाने की दिशा में मील का पत्थर स्थापित किया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक चेतना को भी जागृत किया।
बी.पी. मंडल: एक नेता, एक विचारधारा
25 अगस्त 1918 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्मे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने बचपन से ही जातिगत भेदभाव को नजदीक से देखा और उसका विरोध भी किया। मधेपुरा (बिहार) के एक संपन्न यादव जमींदार परिवार से आने वाले मंडल ने जब अपने छात्रावास में भोजन के लिए जाति के आधार पर भेदभाव देखा, तो साथी छात्रों के साथ विरोध कर उस व्यवस्था को बदलवा दिया।
अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने 23 साल की उम्र में भागलपुर जिला परिषद से की। इसके बाद वे चार बार बिहार विधानसभा और तीन बार लोकसभा के सदस्य बने। वे 1968 में बिहार के सातवें मुख्यमंत्री बने, हालांकि उनका कार्यकाल मात्र 47 दिनों का रहा, लेकिन यह पहला मौका था जब राज्य की सत्ता में पिछड़े वर्गों की भागीदारी प्रमुखता से देखने को मिली।
मंडल आयोग: सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम
1978 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) का गठन किया। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) को 27% आरक्षण की सिफारिश की गई थी।
हालांकि तत्कालीन सरकारों (इंदिरा गांधी और राजीव गांधी) ने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया, लेकिन 1989 में जब वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान कर दिया।
वी.पी. सिंह का साहसिक निर्णय और देशव्यापी प्रतिक्रिया
वी.पी. सिंह ने कहा:
“मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना हमारे पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा है और अब समय आ गया है कि इसे चरणबद्ध रूप से लागू किया जाए।”
कैबिनेट ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। लेकिन देशभर में आरक्षण के खिलाफ जोरदार विरोध हुआ, खासकर उच्च जातियों के छात्रों द्वारा। वहीं, पिछड़े वर्ग के छात्र सड़कों पर समर्थन में उतर आए। इस टकराव ने भारतीय राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
यही वह दौर था जब इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार नामक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र ने नोटिफिकेशन पर रोक लगाई, लेकिन तीन साल बाद संविधान पीठ ने आरक्षण को वैध ठहराया।
“मंडल बनाम कमंडल”: दो ध्रुवों की राजनीति
मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से जहां मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, शरद यादव, नीतीश कुमार और मायावती जैसे सामाजिक न्याय के नेताओं का उदय हुआ, वहीं आरक्षण विरोध के साथ ही कमंडल राजनीति, यानी राम मंदिर आंदोलन, ने भी जोर पकड़ा। इस टकराव ने भारत में नए सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया।
बी.पी. मंडल की विरासत
1982 में बी.पी. मंडल का निधन हो गया, वे अपनी रिपोर्ट की ऐतिहासिक सफलता को देख नहीं पाए। लेकिन उनकी सोच और संघर्ष आज भी जीवित है। उनके नाम पर प्रतिमाएं, संस्थान और स्मारक बन चुके हैं, और उन्हें पिछड़े वर्गों के मसीहा के रूप में याद किया जाता है।
मंडल आयोग की रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखी गई ये पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं:
“समानता सिर्फ समान लोगों के बीच हो सकती है। असमानों को समान मानना, असमानता को बनाए रखने जैसा है।”
बी.पी. मंडल न केवल एक नेता थे, बल्कि वे एक विचारधारा के वाहक थे जिन्होंने भारत को सामाजिक न्याय की नई राह दिखाई — एक ऐसी राह जो आज भी राजनीतिक और सामाजिक चेतना को दिशा दे रही है।