
नई दिल्ली: चीन के विदेश मंत्री वांग यी की हालिया भारत यात्रा ने भले ही कूटनीतिक सुर्खियां बटोरी हों और दोनों देशों ने “संबंधों में नई ऊर्जा” की बात की हो, लेकिन इसके बाद कई गंभीर और असहज सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। भारत और चीन के बीच संबंधों की पेचीदगियों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा सिर्फ प्रतीकों तक सीमित रही और मूलभूत रणनीतिक मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं।
यहाँ उन सात प्रमुख सवालों पर नजर डालते हैं, जिनका जवाब मोदी सरकार को अब तक नहीं देना आया है:
1. क्या लद्दाख में LAC की स्थिति अप्रैल 2020 से पहले जैसी हो गई है?
सरकार ने चीन के साथ सामान्यीकरण की दिशा में कदम उठाए हैं। जैसे कि सीधी उड़ानों का पुनः आरंभ, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा। लेकिन अब भी कई फ्रिक्शन पॉइंट्स पर भारतीय गश्त नहीं हो पा रही, जिससे साफ है कि यथास्थिति की बहाली नहीं हुई है।
सवाल यह है: अगर बिना सीमा समाधान के सामान्य रिश्ते संभव हैं, तो फिर भविष्य में भारत अपनी रणनीतिक पकड़ कैसे बनाएगा?
2. क्या भारत ने ‘वन चाइना पॉलिसी’ दोहराई जबकि स्टेपल वीज़ा का मुद्दा अब भी कायम है?
चीन के आधिकारिक बयान के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि “ताइवान चीन का हिस्सा है”, जबकि एनएसए अजीत डोभाल ने भी ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन किया। यह बयान ऐसे समय आया है जब बीजिंग अब भी जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल के नागरिकों को स्टेपल वीजा दे रहा है।
सवाल है: बिना चीन की नीति बदले भारत ने इतनी बड़ी राजनयिक रियायत क्यों दी?
3. ‘अर्ली हार्वेस्ट’ प्रस्ताव पर यू-टर्न क्यों?
मोदी सरकार ने 2019 में जिसे ठुकराया था, अब वही ‘अर्ली हार्वेस्ट’ बाउंड्री डील को स्वीकार ने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव से चीन को भूटान सीमा पर स्वतंत्र समझौता करने की छूट मिलेगी और भारत की समग्र रणनीति कमजोर होगी।
क्या यह नीति बदलाव बिना संसदीय बहस के सही ठहराया जा सकता है?
4. क्या चीन सिर्फ आपात स्थिति में ही जल डेटा साझा करेगा?
ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के मेगा डैम निर्माण से भारत की चिंता बनी हुई है। इसके बावजूद, चीन ने सिर्फ “मानवीय आधार पर आपातकाल में” ही जल आंकड़े साझा करने का वादा किया है।
क्या यह भारत की जल सुरक्षा और रणनीतिक संप्रभुता के साथ समझौता नहीं है?
5. क्या चीन पाकिस्तान को सैन्य सहायता देना बंद करेगा?
हालिया संघर्षों में चीन से मिले हथियारों के कारण भारत को गंभीर नुकसान उठाना पड़ा है। फिर भी, वांग यी की यात्रा के दौरान मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक दबाव नहीं डाला।
जब तक चीन पाकिस्तान को सैन्य समर्थन देता रहेगा, क्या भारत दोहरी रणनीतिक घेराबंदी से जूझता नहीं रहेगा?
6. क्या चीन ने भारत के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर कोई भरोसेमंद आश्वासन दिया?
DAP उर्वरक, रेयर अर्थ और बोरिंग मशीन जैसे रणनीतिक उत्पादों की आपूर्ति को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं मिली। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी रेयर अर्थ आपूर्ति को लेकर किसी समझौते की जानकारी से इनकार किया है।
क्या भारत अपनी आपूर्ति श्रृंखला को चीन के अधीन होने की स्थिति में डाल रहा है?
7. व्यापार घाटे और आर्थिक असंतुलन पर चीन की कोई ठोस योजना है क्या?
भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है, और वांग यी की यात्रा के दौरान इसे कम करने की कोई ठोस घोषणा नहीं हुई। इसके विपरीत, व्यापार बढ़ाने की बात कही गई, जिससे घाटा और भी बढ़ सकता है।
निष्कर्ष: क्या भारत रणनीतिक जमीन खो रहा है?
इन सवालों से यह स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार ने राजनीतिक लाभ या छवि सुधार के लिए कूटनीतिक मूल्यों पर समझौता किया है। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, जल सुरक्षा और पाकिस्तान को लेकर चीन की भूमिका जैसे अहम मुद्दे या तो अनदेखे रह गए या फिर चीन को बिना किसी ठोस जवाबदेही के राहत मिल गई।
यदि भारत-चीन संबंधों की सामान्यता का मतलब है कि भारत ही हर बार झुके, तो यह न केवल रणनीतिक कमजोरी है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा भी है।
(संपादकीय टिप्पणी: जब तक सरकार इन मुद्दों पर स्पष्टता और पारदर्शिता नहीं दिखाती, तब तक चीन के साथ कोई भी “सामान्य संबंध” भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।)