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Home Breaking News न्याय दो या मार दो: आखिर केन–बेतवा परियोजना पर ‘चिता आंदोलन’ क्यों?

न्याय दो या मार दो: आखिर केन–बेतवा परियोजना पर ‘चिता आंदोलन’ क्यों?

क्या बुंदेलखंड को पानी देने वाली परियोजना अपने ही लोगों के विरोध में फँस गई है?

न्याय दो या मार दो!”

यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज़ है जो मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों में केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में प्रतीकात्मक चिता आंदोलन” कर रहे हैं। कई महिलाओं और ग्रामीणों ने जलती नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर यह संदेश दिया कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला, तो यह उनके लिए विस्थापन मृत्यु के समान है।

केन–बेतवा परियोजना क्या है?

केन–बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली प्रमुख राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना है।

इसका उद्देश्य है—

  • केन नदी का अतिरिक्त जल बेतवा नदी बेसिन तक पहुँचाना।
  • बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों को सिंचाई उपलब्ध कराना।
  • लाखों लोगों को पेयजल उपलब्ध कराना।
  • जलविद्युत उत्पादन बढ़ाना।

इसके पहले चरण में दौधन (Daudhan) बांध, लगभग 221 किलोमीटर लंबी नहर, पावर हाउस और अन्य संरचनाएँ बनाई जानी हैं। सरकार का कहना है कि इससे लगभग 10 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को सिंचाई और करीब 62 लाख लोगों को पेयजल का लाभ मिलेगा।

सरकार का पक्ष

केंद्र और राज्य सरकारों का कहना है कि यह परियोजना दशकों से पानी की कमी झेल रहे बुंदेलखंड के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।

सरकार के प्रमुख दावे हैं:

  • सूखा प्रभावित क्षेत्र को स्थायी जल उपलब्धता।
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती।
  • रोजगार के अवसर।
  • जलविद्युत उत्पादन।
  • क्षेत्रीय विकास को गति।

सरकार यह भी कहती है कि प्रभावित परिवारों को मुआवज़ा और पुनर्वास पैकेज दिया जा रहा है।

फिर विरोध क्यों?

यहीं से कहानी बदल जाती है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि उनका विरोध पानी या विकास से नहीं है।

उनका कहना है कि-

हम विकास के खिलाफ़ नहीं हैं, लेकिन अपने अस्तित्व की कीमत पर विकास स्वीकार नहीं करेंगे।”

उनकी प्रमुख आपत्तियाँ हैं:

  • पर्याप्त और समय पर मुआवज़ा नहीं मिला।
  • पुनर्वास की प्रक्रिया अधूरी है।
  • “ज़मीन के बदले ज़मीन” की मांग पूरी नहीं हुई।
  • कई परिवारों को नया ठिकाना मिलने से पहले ही बेदखल करने का आरोप।
  • वनाधिकार और पारंपरिक आजीविका की अनदेखी।
  • परियोजना से जुड़े निर्णयों में स्थानीय समुदाय की पर्याप्त भागीदारी नहीं।

चिता आंदोलन क्या है?

अप्रैल 2026 में आंदोलन ने नया रूप लिया।

आदिवासी महिलाओं और ग्रामीणों ने प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर प्रदर्शन किया।

इस आंदोलन का संदेश था-

अगर न्याय नहीं मिलेगा, तो हमारे लिए यह जीवन भी किस काम का?”

इसी कारण इसे चिता आंदोलन” कहा गया।

हाल ही में यह आंदोलन फिर तेज़ हुआ और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुनर्वास, मुआवज़े और प्रशासनिक आश्वासनों पर पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है।

पर्यावरण का सवाल

यह विवाद केवल लोगों तक सीमित नहीं है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि इस परियोजना से-

  • पन्ना टाइगर रिज़र्व का एक हिस्सा प्रभावित होगा।
  • जंगलों और वन्यजीव आवास पर असर पड़ सकता है।
  • जैव विविधता को नुकसान होने की आशंका है।

हालाँकि सरकार का कहना है कि पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया पूरी की गई है और प्रभावों को कम करने के उपाय किए जा रहे हैं।

 

विकास बनाम विस्थापन

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न है।

क्या विकास के लिए कुछ लोगों का विस्थापन स्वीकार्य है?

यदि हाँ-

तो उनकी गरिमा, पुनर्वास और आजीविका की जिम्मेदारी किसकी होगी?

एक ओर सरकार कहती है कि लाखों लोगों को पानी मिलेगा।

दूसरी ओर प्रभावित परिवार पूछ रहे हैं-

अगर विकास हमारे घर, हमारी ज़मीन और हमारी पहचान छीन ले, तो क्या उसे विकास कहा जाएगा?”

मुख्य मांगें

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें-

  • निष्पक्ष पुनर्वास।
  • पर्याप्त एवं समयबद्ध मुआवज़ा।
  • ज़मीन के बदले ज़मीन (जहाँ संभव हो)।
  • वनाधिकारों का सम्मान।
  • पुनर्वास पूरा होने से पहले बेदखली न हो।
  • प्रभावित परिवारों से संवाद और पारदर्शिता।

निष्कर्ष

  • केन–बेतवा परियोजना केवल एक बांध या नहर का सवाल नहीं है।
  • यह भारत के विकास मॉडल पर एक बड़ा प्रश्न भी है।

क्या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट लाखों लोगों का भविष्य बदल सकते हैं? निस्संदेह।

लेकिन क्या वे उन लोगों के अधिकारों, पुनर्वास और सम्मान को भी समान महत्व देंगे जो इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं?

शायद इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए आज भी कुछ लोग चिता पर लेटकर कह रहे हैं-

न्याय दो या मार दो।”

यह कहानी केवल पानी की नहीं, बल्कि विकास और न्याय के बीच संतुलन की भी है।

Bhavishya
एक विचारशील लेखक, जो समाज की नब्ज को समझता है और उसी के आधार पर शब्दों को पंख देता है। लिखता है वो, केवल किताबों तक ही नहीं, बल्कि इंसानों की कहानियों, उनकी संघर्षों और उनकी उम्मीदों को भी। पढ़ना उसका जुनून है, क्योंकि उसे सिर्फ शब्दों का संसार ही नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगियों का हर पहलू भी समझने की इच्छा है।