दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला को 29 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की दी अनुमति, केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप किया और आदेश वापस लिया।

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23 अक्टूबर को पति की मौत के बाद सदमे में थी महिला।

अजन्मे बच्चे के “जीवन का अधिकार” और उसके जीवित रहने की संभावनाओं में सुधार की मांग करते हुए, केंद्र सरकार ने मामले की दोबारा जांच के लिए आवेदन दायर किया है। जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली हाई कोर्ट को अपने पहले के आदेश को वापस लेना पड़ा, जिसमें 29 सप्ताह की गर्भवती महिला को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण अपना अबॉर्शन (गर्भपात) करने की अनुमति दी गई थी।

अक्टूबर 2023 में अपने पति को खोने वाली महिला ने अत्यधिक भावनात्मक परेशानी और आत्महत्या की प्रवृत्ति व्यक्त करते हुए अपनी प्रेगनेंसी (गर्भावस्था) को समाप्त करने की अनुमति मांगने के लिए दिसंबर में अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

4 जनवरी के आदेश में, न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने महिला के प्रजनन विकल्प के अधिकार और उसके प्रजनन न करने के विस्तार को स्वीकार करते हुए, गर्भावस्था की समाप्ति के लिए 24 सप्ताह की कानूनी सीमा से अधिक होने के बावजूद अबॉर्शन (गर्भपात) की अनुमति दी।

हालाँकि, केंद्र ने फैसले पर आपत्ति जताई और तर्क दिया कि इस गर्भकालीन आयु में भ्रूण के “जीवित रहने की उचित संभावना है” और अजन्मे बच्चे के जीवन के अधिकार की रक्षा के महत्व पर जोर दिया।

AIIMS ने केंद्र की याचिका का समर्थन करते हुए अदालत को सूचित किया कि कुछ और हफ्तों तक गर्भावस्था जारी रखना नवजात के सर्वोत्तम स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा, और सिफारिश की कि बच्चे का जन्म 34 सप्ताह के बाद किया जाए।

संशोधित दलीलों और AIIMS की मेडिकल राय का जवाब देते हुए, उच्च न्यायालय ने केंद्र की याचिका को बरकरार रखा और अपने पहले के आदेश को वापस ले लिया।

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