फॉर्म-6 में बदलाव, 97 वोटरों का मामला… चुनाव आयोग ने आजतक के सवालों पर क्या कहा?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग से जुड़े कई सवाल इन दिनों चर्चा में हैं। फॉर्म-6 में बदलाव, ERO को डिजिटल सिस्टम की पहुंच और गोवा के 97 मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल न होने के मामले पर भी सवाल उठे हैं। इन मुद्दों पर आजतक ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा, जिसके जवाब में आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

सबसे पहले बात फॉर्म-6 की। फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। हालांकि, SIR के तहत इसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ना जरूरी किया गया है। इस घोषणा पत्र में आवेदक से पहले हुए SIR के दौरान उसके, उसके माता-पिता या दादा-दादी के नाम मतदाता सूची में होने से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है।

आयोग के मुताबिक, यह व्यवस्था 24 जून 2025 के SIR निर्देशों और 14 मई 2026 के SIR आदेश में शामिल प्रावधानों के तहत लागू की गई है। आयोग ने यह भी कहा कि फॉर्म-6 में औपचारिक बदलाव करने का अधिकार कानून मंत्रालय के पास है, इसलिए आयोग ने फॉर्म के साथ अतिरिक्त घोषणा पत्र को जरूरी किया है।

हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी आपत्तियां सामने आने की रिपोर्टें आई हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 से जुड़े बदलावों और उनकी प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि घोषणा वाला हिस्सा अलग से अनिवार्य नहीं दिखता था, लेकिन उसे पूरा किए बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

अब दूसरा सवाल ERO यानी Electoral Registration Officer के अधिकारों और डिजिटल सिस्टम की पहुंच को लेकर है। ERO मतदाता सूची तैयार करने, उसमें नाम जोड़ने, हटाने और सुधार जैसे कामों के लिए जिम्मेदार अधिकारी होते हैं। आजतक के सवाल पर चुनाव आयोग ने कहा कि ERO के पास ERONET का पूरा और बिना किसी रोक-टोक के एक्सेस है।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि ECINET सिर्फ एक सुविधा देने वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म है। मतदाता को स्वीकार या अस्वीकार करने का फैसला ERO के आदेश और संबंधित प्रक्रिया के तहत ही होता है। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची तैयार करने का अधिकार ERO के पास ही है और ECINET इस प्रक्रिया को संचालित करने में तकनीकी सुविधा देता है।

तीसरा और सबसे ज्यादा चर्चा में आया मामला गोवा के 97 मतदाताओं का है। SIR प्रक्रिया के दौरान इन मतदाताओं के नामों को लेकर विसंगतियां सामने आई थीं। संबंधित अधिकारियों ने जांच और सुनवाई के बाद इन लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने योग्य माना था, लेकिन बाद में अंतिम सूची में इनके नाम शामिल नहीं हो सके।

चुनाव आयोग के मुताबिक, इन 97 नामों को पहले रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों के आधार पर हटाया गया था। बाद में संबंधित ERO ने दोबारा जांच के बाद नाम वापस जोड़ने की कोशिश की, लेकिन सिस्टम में एक बार Form-7 के जरिए नाम हटाए जाने के बाद उसे उसी प्रक्रिया में वापस लाने यानी ‘रोलबैक’ की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। आयोग के अनुसार, इसी तकनीकी स्थिति के कारण 21 फरवरी को जारी अंतिम मतदाता सूची में ये 97 नाम शामिल नहीं हो सके।

आयोग ने यह भी कहा कि इन 97 लोगों का मतदान का अधिकार स्थायी रूप से खत्म नहीं हुआ है। उसके मुताबिक, वे Form-6 के जरिए दोबारा मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

हालांकि, इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब संबंधित ERO ने इन 97 मतदाताओं को दोबारा शामिल करने योग्य माना था, तब अंतिम सूची जारी होने से पहले तकनीकी समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाया। इसी तरह, फॉर्म-6 और SIR से जुड़े फैसलों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर सामने आई असहमतियों पर भी सवाल बने हुए हैं। आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने इन आपत्तियों के बावजूद आदेश जारी किए जाने के सवाल पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

इस पूरे विवाद में एक तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं हुआ है और केवल अतिरिक्त घोषणा पत्र को जरूरी किया गया है। दूसरी तरफ, चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और गोवा के 97 मतदाताओं के मामले ने मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया, तकनीकी व्यवस्था और निर्णय लेने की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इन दोनों पक्षों को अलग-अलग समझना जरूरी है, क्योंकि आयोग ने अपने जवाब में प्रक्रिया और तकनीकी व्यवस्था पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है, जबकि कुछ आपत्तियां और सवाल अभी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं।