डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर आ गया है। हरियाणा सरकार ने उसे 21 दिनों की अस्थायी रिहाई दी है। यह उसकी 2017 में दोषसिद्धि के बाद 17वीं अस्थायी रिहाई बताई जा रही है।
राम रहीम बलात्कार के मामलों में 20 साल की सजा काट रहा है और हत्या के एक मामले में भी दोषी ठहराया जा चुका है। ऐसे में बार-बार मिलने वाली पैरोल या फरलो को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
खास तौर पर इस बार उसकी रिहाई के बाद विपक्षी नेताओं और सिख संगठनों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बार-बार अस्थायी रिहाई मिलने से कानून के समान इस्तेमाल और जेल नियमों की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
वहीं, राम रहीम की हर रिहाई को लेकर यह भी चर्चा होती रही है कि डेरा सच्चा सौदा का बड़ा अनुयायी आधार राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है। हालांकि, किसी खास रिहाई को राजनीतिक लाभ से जोड़ना तभी उचित होगा जब उसके समर्थन में ठोस तथ्य या आधिकारिक प्रमाण मौजूद हों।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बार-बार अस्थायी रिहाई दिए जाने के पीछे कानूनी प्रक्रिया क्या है और क्या इस मामले में नियम सभी कैदियों पर एक समान तरीके से लागू हो रहे हैं? राम रहीम की ताजा रिहाई ने एक बार फिर इसी बहस को तेज कर दिया है।











