बांग्लादेश चुनाव 2026: जमात-ए-इस्लामी की बड़ी उम्मीदें क्यों नहीं हुईं पूरी?
ढाका: 12 फरवरी 2026 को हुए बांग्लादेश के आम चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी के नेताओं और समर्थकों में काफी उत्साह था। राजनीतिक जानकारों का मानना था कि पार्टी स्वतंत्रता के बाद का अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। पार्टी को उम्मीद थी कि वह सिर्फ चुनाव नहीं लड़ेगी, बल्कि सत्ता की दौड़ में भी मजबूत दावेदारी पेश करेगी।
लेकिन जैसे-जैसे नतीजे सामने आए, तस्वीर बदलती गई।
BNP के पक्ष में गया माहौल
चुनाव के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने जीत का दावा किया और कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने भी उसे बधाई दी। दूसरी ओर, जमात ने नतीजों की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कहा कि वह चुनाव परिणामों के प्रबंधन से संतुष्ट नहीं है।
राजनीतिक माहौल तेजी से BNP के पक्ष में जाता दिखाई दिया। 2024 के जनआंदोलन के बाद हुए इस पहले आम चुनाव में BNP ने बड़ी जीत हासिल करने का दावा किया। पार्टी प्रमुख तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना मजबूत हो गई।
शुरुआत अच्छी रही, लेकिन बढ़त नहीं बची
2024 में हुए छात्र आंदोलन के बाद, जिसने शेख हसीना सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था, जमात-ए-इस्लामी काफी सक्रिय और मजबूत नजर आ रही थी। चूंकि आवामी लीग चुनाव नहीं लड़ रही थी, इसलिए जमात को लगा कि उसके लिए बड़ा अवसर पैदा हुआ है।
शुरुआत में पार्टी को कुछ रणनीतिक फायदा भी मिला क्योंकि BNP का चुनाव अभियान थोड़ी देर से गति पकड़ पाया। इस दौरान जमात ने कई इलाकों में अपना संगठन मजबूत किया।
लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आया, स्थिति बदलने लगी।
युवा, महिलाएं और अल्पसंख्यक BNP के साथ गए
जिन युवा मतदाताओं ने 2024 के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उनमें से बड़ी संख्या BNP के साथ चली गई। महिलाओं का समर्थन भी जमात को उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला।
हिंदू समेत कई अल्पसंख्यक समुदायों ने भी BNP को प्राथमिकता दी। यहां तक कि आवामी लीग के समर्थकों ने भी जमात का समर्थन नहीं किया और BNP के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण होता गया।
इस तरह जो राजनीतिक मैदान शुरुआत में खुला हुआ दिख रहा था, वह धीरे-धीरे BNP के पक्ष में एकजुट हो गया।
अमेरिका से कथित संपर्कों पर भी विवाद
चुनाव के दौरान कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि अमेरिकी राजनयिकों ने जमात-ए-इस्लामी के नेताओं से मुलाकात की थी। इन खबरों के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ गया।
BNP के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने आरोप लगाया कि जमात और अमेरिका के बीच कोई गुप्त समझौता हो सकता है, जो देश की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकता है।
हालांकि, जमात ने किसी भी गुप्त समझौते से इनकार किया और कहा कि विदेशी राजनयिकों के साथ बैठकें चुनाव, लोकतंत्र और द्विपक्षीय सहयोग जैसे मुद्दों पर सामान्य चर्चा का हिस्सा थीं।
अतीत अब भी पीछा नहीं छोड़ रहा
जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में इस्लामी विद्वान सैयद अबुल आला मौदूदी ने की थी।
1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया था और पश्चिमी पाकिस्तान का समर्थन किया था। इसी कारण पार्टी का इतिहास आज भी विवादों से जुड़ा हुआ है।
आजादी के बाद 1972 में पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, हालांकि 1979 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया। बाद में पार्टी BNP के साथ गठबंधन सरकारों में भी शामिल रही।
शेख हसीना के शासनकाल में जमात के कई वरिष्ठ नेताओं पर युद्ध अपराधों के मामले चले और कुछ नेताओं को फांसी भी दी गई। 2013 में बांग्लादेश हाई कोर्ट ने पार्टी का राजनीतिक पंजीकरण भी रद्द कर दिया था।
नई छवि बनाने की कोशिश
2024 के आंदोलन के बाद जमात ने अपनी छवि बदलने का प्रयास किया। पार्टी ने खुद को “सुधारवादी” और “लोकतंत्र समर्थक” बताना शुरू किया।
उसने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात की, पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया और कई मुद्दों पर अपनी भाषा को पहले की तुलना में नरम बनाया।
पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान ने चुनाव प्रचार के दौरान महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार-मुक्त शासन और न्याय आधारित समाज का वादा किया।
उम्मीद और हकीकत के बीच
जमात-ए-इस्लामी के लिए यह चुनाव केवल सीटें जीतने का मामला नहीं था, बल्कि अपनी राजनीतिक वापसी और स्वीकार्यता साबित करने की भी लड़ाई थी।
हालांकि पार्टी ने खुद को फिर से राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन मतदाताओं का बड़ा वर्ग BNP के पक्ष में एकजुट हो गया।
इस चुनाव ने यह दिखाया कि राजनीतिक छवि बदलना और जनता का भरोसा दोबारा जीतना एक लंबी प्रक्रिया है। जमात की वापसी जरूर हुई है, लेकिन उसकी सत्ता तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा फिलहाल अधूरी रह गई।












