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रंगमंच की दुनिया के महान हस्ताक्षर रतन थियाम का 77 वर्ष की आयु में निधन, सांस्कृतिक युग का अंत

रंगमंच की दुनिया के महान हस्ताक्षर रतन थियाम का 77 वर्ष की आयु में निधन, सांस्कृतिक युग का अंत
रंगमंच की दुनिया के महान हस्ताक्षर रतन थियाम का 77 वर्ष की आयु में निधन, सांस्कृतिक युग का अंत

नई दिल्ली: भारतीय रंगमंच और सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बुधवार को समाप्त हो गया। मणिपुर के प्रसिद्ध रंगकर्मी, नाटककार, कवि और निर्देशक रतन थियाम का 77 वर्ष की उम्र में इंफाल स्थित रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। रतन थियाम के निधन से न केवल मणिपुर बल्कि पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई।

मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने दी श्रद्धांजलि

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त करते हुए कहा:

“श्री रतन थियाम के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करता हूं। वे भारतीय रंगमंच के एक प्रकाश स्तंभ थे और मणिपुर के एक महान पुत्र। उनकी कला के प्रति निष्ठा, दूरदृष्टि और मणिपुरी संस्कृति के प्रति प्रेम ने पूरे विश्व को समृद्ध किया।”

एक कलाकार की यात्रा: चित्रकला से मंच तक

रतन थियाम की रचनात्मक यात्रा की शुरुआत चित्रकला, कविता और लघु कहानियों से हुई थी। प्रारंभिक दिनों में वे रंगमंच के आलोचक के रूप में भी सक्रिय रहे। धीरे-धीरे उनका रुझान मंच की ओर बढ़ा और उन्होंने नाटक लिखना और निर्देशन करना शुरू किया। उनके नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता थी प्राचीन भारतीय परंपराओं को समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत करना।

‘थिएटर ऑफ रूट्स’ आंदोलन के स्तंभ

1970 के दशक में, जब भारतीय रंगमंच पर पश्चिमी प्रभाव हावी था, तब रतन थियाम ने ‘थिएटर ऑफ रूट्स’ आंदोलन को एक नई पहचान दी। इस आंदोलन का उद्देश्य था भारतीय संस्कृति, दर्शन और पारंपरिक कलाओं को मंच पर पुनः प्रस्तुत करना।

रतन थियाम के प्रसिद्ध नाटक

रतन थियाम के नाटक केवल कथानक तक सीमित नहीं होते थे, बल्कि उनमें संगीत, दृश्य प्रभाव और संवाद की अद्भुत रचनात्मकता होती थी। उनके प्रमुख नाटकों में शामिल हैं:

  • ‘उत्तरप्रियदर्शी’
  • ‘करणभारम’
  • ‘द किंग ऑफ डार्क चेंबर’
  • ‘इम्फाल इम्फाल’

इन नाटकों के माध्यम से वे सामाजिक संदेश और सांस्कृतिक चेतना को मंच पर जीवंत करते थे।

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और सम्मान

रतन थियाम को उनकी कला साधना के लिए 1987 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। वे 2013 से 2017 तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने रंगमंच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई अहम पहल कीं। भारत सरकार ने उन्हें 1989 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया।

रतन थियाम का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं है, बल्कि भारतीय रंगमंच की आत्मा के एक स्तंभ का अवसान है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को भारतीय रंग परंपरा की गहराई और वैश्विक मंच पर इसकी प्रस्तुति के लिए प्रेरित करती रहेगी। उनकी यादें, उनके नाटक और उनके विचार, भारतीय रंगमंच को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।

Bhavishya
एक विचारशील लेखक, जो समाज की नब्ज को समझता है और उसी के आधार पर शब्दों को पंख देता है। लिखता है वो, केवल किताबों तक ही नहीं, बल्कि इंसानों की कहानियों, उनकी संघर्षों और उनकी उम्मीदों को भी। पढ़ना उसका जुनून है, क्योंकि उसे सिर्फ शब्दों का संसार ही नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगियों का हर पहलू भी समझने की इच्छा है।