सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए कानून में किया बड़ा बदलाव, अब ED नहीं कर सकेगी मनमानी

Supreme Court PMLA
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सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए कानून में किया बड़ा बदलाव, अब ED नहीं कर सकेगी मनमानी

सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए कानून में किया बड़ा बदलाव, अब ED नहीं कर सकेगी मनमानी

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि प्रवर्तन निदेशालय यानि ED किसी व्यक्ति को धन शोधन निवारण अधिनियम मतलब पीएमएलए के तहत सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकता है, जब एक विशेष अदालत उसकी शिकायत का संज्ञान ले लेती है और एजेंसी को उस व्यक्ति की हिरासत चाहिए तो उसे अदालत से इजाजत लेना होगा।

आपको बता दें कि न्यायमूर्ति अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ, जो तरसेम लाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय, जालंधर क्षेत्रीय कार्यालय मामले की सुनवाई कर रही थी, उन्होंने कहा कि, “धारा 44 के तहत शिकायत के आधार पर पीएमएलए की धारा 4 के तहत दंडनीय अपराध का संज्ञान लेने के बाद, ईडी और उसके अधिकारी शिकायत में आरोपी के रूप में दिखाए गए व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए धारा 19 के तहत शक्तियों का प्रयोग करने में असमर्थ हैं। यदि ईडी उसी अपराध में आगे की जांच करने के लिए समन की तामील के बाद पेश होने वाले आरोपी की हिरासत चाहता है, तो ईडी को विशेष अदालत में आवेदन करके आरोपी की हिरासत मांगनी होगी।”

“यदि आरोपी समन के बाद विशेष अदालत के समक्ष पेश होता है, तो उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाएगा जैसे कि वह हिरासत में है। इसलिए, उसके लिए जमानत के लिए आवेदन करना आवश्यक नहीं है। हालांकि, विशेष अदालत आरोपी को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 88 के तहत बांड प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या किसी आरोपी को, सम्मन के जवाब में विशेष न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के बाद भी सीआरपीसी की धारा 437 के तहत जमानत के लिए आवेदन करना होगा और यदि उसे ऐसा करना है, तो क्या यह पीएमएलए की धारा 45 द्वारा लगाई गई दोहरी शर्तों द्वारा शासित होगा। जिसके बाद ईडी जालंधर जोनल कार्यालय द्वारा चलाए गए मामले में, सीआरपीसी की धारा 88 के तहत पीएमएलए मामले के आरोपी द्वारा निष्पादित बांड को जमानत कार्यवाही के रूप में माना गया, भले ही वह उसे जारी किए गए सम्मन के अनुपालन में अदालत के समक्ष उपस्थित हुआ हो। परिणामस्वरूप, उसे जमानत मांगनी पड़ी। इसके बाद उसने अग्रिम जमानत देने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उसे राहत देने से इनकार करते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि उसने पीएमएलए की धारा 45 के तहत दूसरी शर्त को पूरा नहीं किया है।

पीठ ने कहा कि विशेष अदालत को “आरोपी की सुनवाई के बाद… संक्षिप्त कारणों को दर्ज करने के बाद आवेदन पर आदेश पारित करना चाहिए। इस तरह के आवेदन पर सुनवाई करते समय, अदालत केवल तभी हिरासत की अनुमति दे सकती है, जब वह संतुष्ट हो कि उस स्तर पर हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता है, भले ही आरोपी को धारा 19 के तहत कभी गिरफ्तार नहीं किया गया हो। यदि जमानती वारंट की तामील संभव नहीं है, तो गैर-जमानती वारंट का सहारा लिया जा सकता है।” पीठ ने कहा, ”सीआरपीसी की धारा 88 के अनुसार प्रस्तुत किया गया बांड केवल उस आरोपी द्वारा दिया गया वचन है जो हिरासत में नहीं है और तय तिथि पर अदालत के समक्ष उपस्थित होगा।” इसलिए, आरोपी से धारा 88 के तहत बांड स्वीकार करने का आदेश जमानत देने के समान नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि गैरहाजिरी के कारण वारंट जारी किया जाता है, तो अदालत के पास वारंट रद्द करने का अधिकार है और जमानत के लिए आवेदन करना आवश्यक नहीं है।

क्या है पीएमएलए ?

धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (Prevention of Money Laundering Act, 2002) भारत के संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य काले धन को सफेद करने से रोकना है। इसमें धन-शोधन से प्राप्त धन को राज्यसात (ज़ब्त) करने का प्रावधान है। यह अधिनियम 1 जुलाई, 2005 से प्रभावी हुआ। मनी लॉन्ड्रिंग वह अपराध है, जो किसी संदिग्ध व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा अपराधिक आय को वैध बनाने में किया जाता है। यह अधिनियम 17 जनवरी 2003 को संसद में पारित किया गया और राष्ट्रपति की अनुमति के बाद यह 1 जुलाई 2005 से लागू हुआ। समय के साथ-साथ इसमें कई संशोधन किये गये। इस अधिनियम के लागू होने उपरांत साल 2009 और फिर 2012 में अहम संशोधन किये गये। वहीं 2015 में “अपराध की आय” की परिभाषा को भी संशोधित किया गया। जिसके अनुसार अपराध की आय को विदेश में ले जाने की स्थिति में अपराधी की घरेलू संपत्तियों को कुर्क/जब्त किया जा सकता है। इस अधिनियम की धारा 447 धोखाधड़ी के लिए सजा से संबंधित है। आपको बता दें कि पीएमएलए की धारा 3 के अनुसार “जो भी व्यक्ति/संस्था प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कालेधन से जुड़ी किसी भी प्रक्रिया या गतिविधि में शामिल है और इसे वैध संपत्ति बनाने या उसका दावा करना और वित्तीय संपत्तियों को छिपाना आदि मनी-लॉन्ड्रिंग के अपराध की श्रेणी में आता है। साथ ही पीएमएलए की धारा 4 में धन शोधन अपराधी के लिए सजा का प्रावधान है। जिसमें दोषी व्यक्ति को 3 साल का कठोर कारावास जिसे 7 साल व कुछ परिस्थितियों में 10 साल तक भी बढ़ाया जा सकता है तथा साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

ईडी की वेबसाइट के अनुसार 31 जनवरी 2023 तक पीएमएलए के तहत 5906 मामले दर्ज किए। जिनमें से 176 मामले मौजूदा व पूर्व सांसदों, विधायकों व एमएलसी के खिलाफ दर्ज हुए, जो कुल मामलों का लगभग 2.98 प्रतिशत है। वहीं 1919 मामलों (जारी पीएओ) में ₹115,350 करोड़ की संपत्ति की कुर्की की गई। 513 व्यक्तियों को पीएमएलए के तहत गिरफ्तार किया गया। पीएमएल की धारा 8(5) के तहत ₹36.23 करोड़ जब्त किये गये तथा अपराधियों पर ₹4.62 करोड़ का जुर्माना भी लगा। वहीं पीएमएल की धारा 8(7) के तहत ₹15587.435 करोड़ जब्त किये गये। इस प्रकार 31 जनवरी 2023 तक ईडी द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत कुल ₹15623.665 करोड़ की संपत्ति पकड़ी गयी।