राम मंदिर के संघर्ष की गाथा!

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22 जनवरी को अयोध्या में श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन होने वाला है, पर यहां तक आने का सफर बिल्कुल आसान नहीं था, देश को बहुत कुछ देखना पड़ा अयोध्या का विवाद सालों से धार्मिक तो है ही पर इसी के साथ ऐतिहासिक सामाजिक और राजनीतिक भी है.

1949 मैं मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्ति रखे जाने पर संपत्ति विवाद पहली बार अदालत में गया.

1950 मैं फैजाबाद सिविल कोर्ट में अर्जी दाखिल हुई रामलाल की पूजा और मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई.

1961 यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने रामलाल की मूर्ति हटाने की मांग की.

1984 में मंदिर बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद में एक कमेटी गठित की.

1986 में हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत मिली.

1992 विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने मस्जिद को गिरा दिया.

6 दिसंबर “देशभर में दंगे भड़के के इसी दिन को ब्लैक डे के नाम से भी कहा जाता है”.

2002 हिंदू कार्यकर्ताओं को लेकर जा रही ट्रेन गोधरा में आग लगा दी गई कई लोग मारे गए इसी वजह से गुजरात में दंगे हुए.

2010 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में मस्जिद ,राम मंदिर और निर्मोही अखाड़े के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया.

2019 सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थ के लिए भेजा फिर मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की.

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पेंशन ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया,
2.77 एकाद विवादित समीन हिंदु पक्ष को मिली, मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश दिया गया.

2020 तकरीबन 28 साल बाद रामलाल टेंट से निकलकर फाइबर के मंदिर में शिफ्ट हुए.

राम मंदिर के भूमि पूजन कार्यक्रम में पीएम नरेंद्र मोदी ,आरएसएस के मोहन भागवत, यूपी के सीएम योगी और साधु संत समेत 175 लोगों को न्योता मिला.

2024 तक राम मंदिर बनने का वादा पूरा हुआ और 22 जनवरी को एक भव्य राम मंदिर देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

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