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दशहरे पर रिलीज़ हुईं ”Kantara A Legend: Chapter 1′ और ‘Sunny Sanskari Ki Tulsi Kumari’, पहले दिन की कमाई में ‘Kantara’ ने मारी बाज़ी

दशहरे पर रिलीज़ हुईं ''Kantara A Legend: Chapter 1' और 'Sunny Sanskari Ki Tulsi Kumari', पहले दिन की कमाई में 'Kantara' ने मारी बाज़ी
दशहरे पर रिलीज़ हुईं ''Kantara A Legend: Chapter 1' और 'Sunny Sanskari Ki Tulsi Kumari', पहले दिन की कमाई में 'Kantara' ने मारी बाज़ी

नई दिल्ली: 2 अक्टूबर 2025, जो इस साल गांधी जयंती और दशहरे के त्योहार के साथ आया, सिनेमा प्रेमियों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं रहा। इस दिन दो बड़ी बजट की बहुप्रतीक्षित फिल्में ऋषभ शेट्टी की ‘कांतारा अ लीजेंड: चैप्टर 1’ और वरुण धवन की ‘सनी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ बॉक्स ऑफिस पर रिलीज़ हुईं।

जहां दोनों फिल्मों की ओपनिंग अच्छी रही, वहीं पहले ही दिन ‘कांतारा अ लीजेंड: चैप्टर 1’ ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर ‘सनी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ को पीछे छोड़ दिया।

‘कांतारा अ लीजेंड: चैप्टर 1’ बनाम ‘सनी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ – पहले दिन की कमाई

‘कांतारा’ की यह प्रीक्वल फिल्म, जो 2022 में आई ब्लॉकबस्टर ‘कांतारा’ का अगला अध्याय है, ने अपने ओपनिंग डे पर ₹60 करोड़ की जबरदस्त कमाई की। फिल्म को कन्नड़, हिंदी, तेलुगु, तमिल, मलयालम, बांग्ला और अंग्रेज़ी सहित कई भाषाओं में रिलीज़ किया गया था।

₹125 करोड़ की भारी भरकम लागत से बनी इस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से जबरदस्त प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। ऋषभ शेट्टी न केवल फिल्म के मुख्य अभिनेता हैं, बल्कि उन्होंने इसका निर्देशन भी किया है। फिल्म में रुक्मिणी वसंथ, गुलशन देवैया और जयराम अहम भूमिकाओं में नजर आए हैं।

वहीं दूसरी ओर, शशांक खेतान निर्देशित रोमांटिक ड्रामा ‘सनी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ ने पहले दिन ₹9.25 करोड़ की कमाई की। इस फिल्म में वरुण धवन और जाह्नवी कपूर मुख्य भूमिका में हैं, जबकि सान्या मल्होत्रा और रोहित सराफ ने सहायक भूमिकाएं निभाई हैं।

फिल्म की हिंदी ऑक्यूपेंसी 2 अक्टूबर को कुल मिलाकर 34.08% रही, जिसमें सबसे अधिक 38.95% दर्शक रात के शो में देखने को मिले।

कुल मिलाकर, दशहरे के मौके पर रिलीज़ हुई ये दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उत्साहजनक शुरुआत करने में सफल रहीं, लेकिन ‘कांतारा अ लीजेंड: चैप्टर 1’ की ऐतिहासिक ओपनिंग ने साफ कर दिया है कि दर्शकों का रुझान इस बार पौराणिकता, रहस्य और प्रकृति की शक्ति को दिखाने वाली कहानी की ओर ज्यादा है।

RIP Pandit Chhannulal Mishra: शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन, मणिकर्णिका घाट पर हुआ अंतिम संस्कार

RIP Pandit Chhannulal Mishra: शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन, मणिकर्णिका घाट पर हुआ अंतिम संस्कार
RIP Pandit Chhannulal Mishra: शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन, मणिकर्णिका घाट पर हुआ अंतिम संस्कार

वाराणसी (उत्तर प्रदेश): पद्म विभूषण से सम्मानित प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का गुरुवार को 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपनी बेटी नम्रता के निवास, मिर्जापुर के गंगादर्शन कॉलोनी में अंतिम सांस ली।

पंडित मिश्र का अंतिम संस्कार वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। उनका अंतिम संस्कार उनके पोते ने किया। उनके पार्थिव शरीर को दोपहर 12:30 बजे उनके पैतृक निवास छोटी गबी, वाराणसी लाया गया, जहां उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री डॉ. दयाशंकर मिश्र, वाराणसी की महापौर, कई विधायक, जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त समेत बड़ी संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए एकत्र हुए। संगीत जगत की कई हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनमें पद्मश्री लोक गायिका मालिनी अवस्थी और शास्त्रीय गायिका डॉ. सोमा घोष शामिल हैं।

पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की और बाद में बनारस में औपचारिक संगीत प्रशिक्षण लिया। उन्होंने किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खां के सान्निध्य में दीर्घकालीन तालीम ली और बनारस घराने के प्रमुख गायक बने। उन्हें ख़याल और पूरब अंग की ठुमरी में विशेष महारत हासिल थी।

पंडित मिश्र को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नौशाद सम्मान, यश भारती पुरस्कार, 2010 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप भी प्राप्त हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पंडित मिश्र के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र जी के निधन से अत्यंत दुःख हुआ है। उन्होंने भारतीय कला और संस्कृति की समृद्धि के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। वे शास्त्रीय संगीत को जन-जन तक पहुंचाने के साथ-साथ भारतीय परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने में भी अग्रणी रहे। मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि उनका स्नेह और आशीर्वाद मुझे हमेशा मिला।”

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी याद किया कि पंडित मिश्र 2014 में वाराणसी लोकसभा सीट से उनके प्रस्तावक थे। पंडित मिश्र अपने पीछे चार बेटियां और एक बेटे का परिवार छोड़ गए हैं। पूरब अंग की ठुमरी शैली के प्रमुख स्तंभों में से एक रहे पंडित छन्नूलाल मिश्र को उनके भावपूर्ण और मधुर गायन के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उनके जाने से भारतीय शास्त्रीय संगीत ने एक अमूल्य रत्न खो दिया है।

Sonam Wangchuk की गिरफ्तारी को लेकर पत्नी गितांजलि की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, राष्ट्रपति से भी लगाई गुहार

Sonam Wangchuk की गिरफ्तारी को लेकर पत्नी गितांजलि की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, राष्ट्रपति से भी लगाई गुहार
Sonam Wangchuk की गिरफ्तारी को लेकर पत्नी गितांजलि की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, राष्ट्रपति से भी लगाई गुहार

लेह: जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गितांजलि जे अंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उनके पति की तत्काल रिहाई की मांग की है। गितांजलि का कहना है कि वांगचुक की गिरफ्तारी अवैध है और उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया गया है।

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर को लेह में हुई हिंसक झड़पों के दो दिन बाद गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेजा गया था। उनकी गिरफ्तारी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई थी। इन झड़पों में चार लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे। ये हिंसा लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन के दौरान हुई थी।

गितांजलि ने कहा कि उनके पति को पाकिस्तान से संबंध होने के झूठे आरोपों में फंसाया गया है, जबकि वह हमेशा देश और सेना के समर्थन में खड़े रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या एक पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में अनियंत्रित विकास के खिलाफ आवाज उठाना कोई अपराध है।

गितांजलि का कहना है कि उन्हें अब तक वांगचुक की हिरासत का आधिकारिक आदेश नहीं मिला है और वह अपने पति से संपर्क नहीं कर पा रही हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें सीआरपीएफ की निगरानी में रखा गया है और हिमाालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव लर्निंग (HIAL) से छात्रों और कर्मचारियों की जानकारी मांगी गई है। HIAL की दो सदस्य भी तीन दिन पहले हिरासत में ली गई हैं।

गितांजलि ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को तीन पन्नों का पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने लिखा है कि वांगचुक ने अपना जीवन लद्दाख के लोगों और देश की सेवा में समर्पित कर दिया है और वे किसी के लिए भी खतरा नहीं हो सकते।

गितांजलि ने कहा कि राष्ट्रपति खुद एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आती हैं, इसलिए उन्हें लद्दाख के लोगों की भावनाएं सबसे बेहतर तरीके से समझ में आएंगी।

उन्होंने राष्ट्रपति से वांगचुक की बिना शर्त रिहाई की मांग की और कहा कि उनके साथ जो हो रहा है, वह एक “विच-हंट” जैसा है, जो पिछले चार वर्षों में जनता की आवाज उठाने के कारण किया जा रहा है।

Bihar Election Opinion Poll: कांग्रेस को झटका, एनडीए को बहुमत, प्रशांत किशोर सीएम की रेस में सबसे आगे

Bihar Election Opinion Poll: कांग्रेस को झटका, एनडीए को बहुमत, प्रशांत किशोर सीएम की रेस में सबसे आगे
Bihar Election Opinion Poll: कांग्रेस को झटका, एनडीए को बहुमत, प्रशांत किशोर सीएम की रेस में सबसे आगे

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों का ऐलान भले ही अभी न हुआ हो, लेकिन चुनावी बिसात पर गोटियां चलनी शुरू हो गई हैं। इस बीच जेवीसी (JVC) द्वारा किए गए ताजा ओपिनियन पोल ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। सर्वे के नतीजे खासकर कांग्रेस के लिए झटका साबित हो रहे हैं, जबकि एनडीए गठबंधन को स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है।

राहुल गांधी को बड़ा झटका

16 अगस्त से 3 सितंबर तक राहुल गांधी, तेजस्वी यादव के साथ बिहार दौरे पर थे और उन्होंने बीजेपी-जेडीयू सरकार पर जमकर हमला बोला। लेकिन जेवीसी सर्वे के अनुसार, राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ अभियान जनता को प्रभावित करने में नाकाम रहा। सर्वे के मुताबिक, 52% लोगों ने उनके आरोपों को बेबुनियाद बताया।

सीटों का गणित: कौन कहां खड़ा?

जेवीसी ओपिनियन पोल में अनुमान लगाया गया है कि नवंबर में होने वाले चुनाव में एनडीए गठबंधन को 131-150 सीटें मिल सकती हैं। इनमें:

  • भाजपा को 66-77 सीटें
  • जेडीयू को 52-58 सीटें
  • अन्य एनडीए सहयोगियों को 13-15 सीटें

वहीं, महागठबंधन को 81-103 सीटें मिलने का अनुमान है, जिनमें:

  • राजद को 57-71 सीटें
  • कांग्रेस को सिर्फ 11-14 सीटें
  • अन्य सहयोगियों को 13-18 सीटें

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को 4-6 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि AIMIM, बसपा और अन्य को भी 5-6 सीटें मिल सकती हैं।

वोट शेयर में भी एनडीए को बढ़त

वोट प्रतिशत के लिहाज से:

  • एनडीए को 41-45% वोट मिलने की उम्मीद
  • महागठबंधन को 37-40%
  • जन सुराज को 10-11% वोट शेयर

इस आंकड़े से यह स्पष्ट होता है कि एनडीए को सिर्फ सीटों में नहीं, वोट प्रतिशत में भी बढ़त मिल रही है।

नीतीश कुमार सबसे पसंदीदा सीएम चेहरा

मुख्यमंत्री पद के लिए पसंद को लेकर किए गए सर्वे में:

  • नीतीश कुमार को 27% समर्थन
  • तेजस्वी यादव को 25%
  • प्रशांत किशोर को 15%
  • चिराग पासवान को 11%
  • सम्राट चौधरी को 8%

इससे संकेत मिलता है कि नीतीश कुमार अब भी सबसे लोकप्रिय चेहरा बने हुए हैं, और जेडीयू के जनाधार में गिरावट की अटकलें फिलहाल गलत साबित हो रही हैं।

कांग्रेस की स्थिति और कमजोर

2020 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा था, लेकिन इस बार स्थिति और खराब होती दिख रही है। सर्वे से संकेत मिला है कि कांग्रेस 2020 के मुकाबले और भी कम सीटों पर सिमट सकती है। राहुल गांधी की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं, खासकर ‘वोट चोरी’ और एसआईआर जैसे मुद्दों को लेकर मतदाताओं में असर न दिखने के कारण।

एक महीने में बदले समीकरण

गौरतलब है कि अगस्त में हुए पिछले सर्वे में जेडीयू की स्थिति कमजोर मानी जा रही थी, लेकिन ताजा सर्वे में जेडीयू को 2020 के मुकाबले 10 सीटों की बढ़त मिलती दिख रही है। यानी, एक महीने में जेडीयू की स्थिति दोगुनी मजबूत हो गई है।

जेवीसी के इस ओपिनियन पोल से साफ है कि बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ी टक्कर का मैदान बनने जा रहा है। लेकिन फिलहाल एनडीए बढ़त बनाए हुए है। नीतीश कुमार एक बार फिर सीएम पद की दौड़ में सबसे आगे हैं, वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा जैसा साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि अगले कुछ महीनों में सियासी समीकरण और जनमानस में क्या बदलाव आता है और क्या कांग्रेस अपनी रणनीति में कोई बड़ा बदलाव करती है या नहीं।

Sonam Wangchuk पर लगे आरोपों पर पत्नी गीतांजलि अंगमो फायर, BJP सरकार के छूटे पसीने

Sonam Wangchuk पर लगे आरोपों पर पत्नी गीतांजलि अंगमो फायर, BJP सरकार के छूटे पसीने
Sonam Wangchuk पर लगे आरोपों पर पत्नी गीतांजलि अंगमो फायर, BJP सरकार के छूटे पसीने

नई दिल्ली: जलवायु कार्यकर्ता और हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) के निदेशक सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके पति के खिलाफ लगाए गए विदेशी संपर्क और वित्तीय गड़बड़ी के आरोप पूरी तरह से झूठे और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कहा कि ये सब केवल उन्हें लद्दाख के हक की आवाज उठाने के लिए निशाना बनाने की साजिश है।

30 सितंबर को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मीडिया से बातचीत करते हुए अंगमो ने कहा कि सरकार ने अभी तक वांगचुक की गिरफ्तारी का कोई औपचारिक आदेश नहीं दिया है। बता दें कि वांगचुक को 27 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेकर राजस्थान के जोधपुर जेल भेजा गया था।

“हम न्याय के लिए लड़ाई जारी रखेंगे”

गीतांजलि अंगमो ने कहा, “हम भारत के कानूनी तंत्र में पूरा विश्वास रखते हैं और अपने पति के लिए न्याय की लड़ाई पूरी ताकत से लड़ेंगे। जब तक सच सामने नहीं आता, हम पीछे नहीं हटेंगे।”

उन्होंने सरकार को चुनौती देते हुए कहा, “अगर सोनम वांगचुक ने कोई गुनाह किया है, तो सबूत सामने लाएं। अगर उनके संगठन HIAL में कोई वित्तीय गड़बड़ी है या विदेशी फंडिंग में कोई उल्लंघन हुआ है, तो उसे साबित करें।”

“जो सरकार सम्मान देती है, वही अब देशद्रोही कह रही है”

गीतांजलि ने सवाल उठाया कि यदि सोनम वांगचुक देश विरोधी हैं, तो उन्हें पहले सम्मान क्यों दिया गया? उन्होंने बताया कि HIAL को केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने पैसिव सोलर हीटेड बिल्डिंग डिजाइन के लिए पहला पुरस्कार दिया था। इसके अलावा, आइस स्तूपा परियोजना को जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने सम्मानित किया था।

उन्होंने कहा, “जब हमारी यूनिवर्सिटी को देश का बेस्ट ईको-प्रोजेक्ट घोषित किया गया, तब क्या हम राष्ट्र विरोधी थे? अगर नहीं, तो अब अचानक ऐसा क्यों कहा जा रहा है?”

“अगर अच्छे काम करने वालों को अपराधी बनाया जाएगा तो प्रेरणा कौन लेगा?”

अंगमो ने कहा कि उनके पति ने 1.8 लाख वर्ग फीट पैसिव सोलर हीटेड स्ट्रक्चर का निर्माण किया है, जिनका इस्तेमाल सेना भी कर रही है। इससे हर महीने 4000 टन कार्बन की बचत हो रही है। उन्होंने कहा, “दुनिया जहां नेट ज़ीरो की बात कर रही है, लद्दाख कार्बन निगेटिव बन चुका है। ऐसे कार्यकर्ता को अपराधी की तरह पेश करना भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने की सोच के खिलाफ है।”

पाकिस्तान यात्रा और विदेशी संबंधों पर जवाब

सोनम वांगचुक के पाकिस्तान से संबंधों के आरोपों को लेकर अंगमो ने स्पष्ट किया कि वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित एक जलवायु सम्मेलन में भाग लेने इस्लामाबाद गए थे। उन्होंने कहा, “क्या हिंदूकुश पर्वत, जो आठ देशों को छूता है और दो अरब लोगों को पानी देता है, पर चर्चा करना देशद्रोह है?”

उन्होंने यह भी बताया कि सोनम वांगचुक ने उस मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मिशन लाइफ’ पहल की खुलकर तारीफ की थी। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि पाकिस्तान का कोई नागरिक लद्दाख में देखा गया था, तो सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन क्यों हुआ?

“FCRA और वित्तीय गड़बड़ी के आरोप बेबुनियाद”

HIAL की FCRA लाइसेंस रद्द किए जाने को लेकर अंगमो ने कहा कि उनके संगठन ने कोई विदेशी चंदा नहीं लिया है। उन्होंने बताया कि विदेशों से जो भी भुगतान आया है, वह सेवा समझौते के तहत है और यह पूरी तरह कानूनी है। CBI ने भी अब तक किसी उल्लंघन की पुष्टि नहीं की है।

उन्होंने कहा कि HIAL का अनुसंधान अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों द्वारा अपनाया गया है और सरकार ने खुद इसकी नीतियों को राज्य में लागू किया है। आइस स्तूपा परियोजना और नई पर्यटन नीति में सोलर हीटिंग अनिवार्य कर दी गई है।

लद्दाख हिंसा को लेकर प्रशासन पर हमला

24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा, जिसमें चार प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी, को लेकर अंगमो ने लद्दाख की केंद्र शासित प्रशासन और उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता तथा पुलिस महानिदेशक एस.डी. जमवाल को जिम्मेदार ठहराया।

उन्होंने कहा, “सोनम पार्क में भूख हड़ताल पर बैठे थे। उन्हें इस हिंसा की कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने पिछले पांच सालों में कभी किसी तरह की हिंसा या उकसावे में भाग नहीं लिया। अब जो हुआ है, उसका जवाब प्रशासन और पुलिस को देना चाहिए।”

“मैगसेसे अवार्ड भी बदनाम करने का जरिया बना दिया गया”

गीतांजलि अंगमो ने कहा कि कुछ लोग वांगचुक को बदनाम करने के लिए यह प्रचार कर रहे हैं कि उन्होंने मैगसेसे पुरस्कार जीता है, जो कुछ ‘देशविरोधियों’ को भी मिला है। उन्होंने जवाब दिया, “भारत के 60 नागरिकों को यह पुरस्कार मिला है, जिनमें से 20 को बाद में पद्म विभूषण भी दिया गया है। क्या सरकार देशविरोधियों को सम्मान देती है?”

निष्कर्ष

गीतांजलि अंगमो का यह प्रेस वार्ता सिर्फ अपने पति के लिए न्याय की मांग नहीं थी, बल्कि यह लद्दाख के हक और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई की एक आवाज थी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सरकार को सबूत पेश करने होंगे, नहीं तो यह साबित होगा कि वांगचुक को एक जनहितैषी कार्यकर्ता से अपराधी बनाने की साजिश रची जा रही है। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है और न्यायिक प्रक्रिया आगे किस दिशा में जाती है।

Bihar Election 2025: क्या है EBC वोटबैंक, जिसको साधने के लिए महागठबंधन ने खेल दिया बड़ा खेल, नीतीश कुमार की बढ़ीं मुश्किलें

Bihar Election 2025: क्या है EBC वोटबैंक, जिसको साधने के लिए महागठबंधन ने खेल दिया बड़ा खेल, नीतीश कुमार की बढ़ीं मुश्किलें
Bihar Election 2025: क्या है EBC वोटबैंक, जिसको साधने के लिए महागठबंधन ने खेल दिया बड़ा खेल, नीतीश कुमार की बढ़ीं मुश्किलें

पटना: आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। 24 सितंबर को महागठबंधन ने ‘अतिपिछड़ा न्याय संकल्प’ के तहत EBC समुदाय के लिए 10 वादों की घोषणा की है। इसे विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के परंपरागत वोटबैंक में सेंध लगाने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) यानी JDU का सबसे मजबूत सामाजिक आधार अति पिछड़ा वर्ग रहा है। अब कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की अगुवाई वाला महागठबंधन EBC समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यदि महागठबंधन EBC वोटों में थोड़ी भी सेंध लगाने में सफल हो गया, तो JDU की सीटों में भारी गिरावट आ सकती है।

कौन हैं अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और क्यों हैं इतने अहम?

बिहार में EBC यानी Extremely Backward Classes राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का एक उपवर्ग हैं। इनमें वे जातियां शामिल हैं जो सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े मानी जाती हैं। हालिया जातीय सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार की 13.07 करोड़ जनसंख्या में EBC की हिस्सेदारी 36.01% है, जो राज्य का सबसे बड़ा सामाजिक समूह है।

EBC में हज्जाम, सहनी, केवट, निषाद, लोहार, कहार, तेली, नोनिया जैसी जातियां शामिल हैं। ये जातियां पारंपरिक रूप से कारीगर, मछुआरे, श्रमिक या सेवा से जुड़ी रहीं हैं। समय के साथ कई जातियों की पारंपरिक आजीविका लुप्त हो गई है, जिससे सामाजिक असुरक्षा और राजनीतिक उपेक्षा की भावना इन वर्गों में बढ़ी है।

‘अतिपिछड़ा न्याय संकल्प’ के 10 वादे

महागठबंधन ने EBC के लिए जिन 10 वादों की घोषणा की है, वे इस प्रकार हैं:

  1. पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण 20% से बढ़ाकर 30% किया जाएगा
  2. आबादी के अनुपात में आरक्षण बढ़ाने के लिए कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डाला जाएगा
  3. भर्तियों में ‘नॉट फाउंड सूटेबल (NFS)’ को अवैध घोषित किया जाएगा
  4. अल्प या अति समावेशन मामलों को लेकर कमिटी बनेगी
  5. भूमिहीन EBC, SC/ST और पिछड़ा वर्ग के लोगों को शहर में 3 डेसिमल और गांव में 5 डेसिमल आवासीय भूमि दी जाएगी
  6. निजी स्कूलों की आरक्षित सीटों में से आधा हिस्सा EBC, SC/ST और पिछड़ा वर्ग के बच्चों को
  7. 25 करोड़ रुपये तक के सरकारी ठेकों में 50% आरक्षण
  8. निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू किया जाएगा
  9. आरक्षण की निगरानी के लिए उच्च अधिकार प्राप्त आरक्षण नियामक प्राधिकरण का गठन
  10. SC/ST एक्ट की तर्ज पर EBC अत्याचार निवारण अधिनियम बनाया जाएगा

क्या महागठबंधन की रणनीति काम करेगी?

पॉलिटिकल विश्लेषक रशीद किदवई के अनुसार, इस समय महागठबंधन का मुख्य लक्ष्य JDU को 25-30 सीटों तक सीमित करना है ताकि NDA के लिए सरकार बनाना मुश्किल हो जाए। यही कारण है कि कांग्रेस और RJD ने EBC पर सीधा फोकस किया है।

हालांकि, चुनौती यह है कि नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में EBC के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं:

  • पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण
  • EBC आयोग का गठन
  • कल्याणकारी योजनाओं के जरिए लक्षित सहायता
  • नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण विस्तार

इसके अलावा, नीतीश सरकार ने महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों के लिए भी नकद हस्तांतरण योजनाएं शुरू की हैं, जिससे EBC समुदाय में सरकार के प्रति समर्थन कायम है।

कांग्रेस और RJD का बदला रुख

एक समय था जब कांग्रेस ने कर्पूरी ठाकुर की आरक्षण नीति का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विरोध किया था। लेकिन समय के साथ उसका रुख बदलता गया। 1990 और 2000 के दशक में कांग्रेस का उच्च जातियों में आधार कमजोर हुआ, जिसके बाद उसने OBC और EBC के लिए आरक्षण समर्थन शुरू किया। अब राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस EBC समुदाय को अपनी चुनावी रणनीति का केंद्र बना रही है।

RJD ने हमेशा OBC और EBC वर्ग को लेकर सक्रिय राजनीतिक पहल की है। लालू यादव के कार्यकाल में इन वर्गों को छात्रवृत्ति, छात्रावास और आरक्षण जैसे कई लाभ मिले।

क्या होगा असर?

फिलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि महागठबंधन EBC वोटों में कितनी सेंध लगा पाएगा, लेकिन यह साफ है कि बिहार चुनाव 2025 का सबसे बड़ा सियासी दांव EBC वोटबैंक पर ही खेला जा रहा है। JDU और BJP की नजर जहां कल्याणकारी योजनाओं और नीतीश के पुराने कामों के सहारे EBC को साथ बनाए रखने की है, वहीं महागठबंधन नए वादों के जरिए इस आधार को डगमगाने की कोशिश कर रहा है।

चुनाव में कौन कितना सफल होता है, यह तो नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल के राजनीतिक संकेत साफ हैं—EBC बिहार चुनाव 2025 का सबसे निर्णायक मतदाता वर्ग बन चुका है।

Sonam Wangchuk News: सोनम वांगचुक को लेकर फैलाई जा रही ‘मनगढ़ंत कहानी’, पत्नी गीता अंजू आंगमो ने लगाए गंभीर आरोप

Sonam Wangchuk News: सोनम वांगचुक को लेकर फैलाई जा रही 'मनगढ़ंत कहानी', पत्नी गीता अंजू आंगमो ने लगाए गंभीर आरोप
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नई दिल्ली/लेह: लद्दाख में हाल ही में हुई अशांति को लेकर गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पर लगे आरोपों को उनकी पत्नी गीता अंजू आंगमो ने पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे एक “मनगढ़ंत कहानी” बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार छठे अनुसूची को लागू न करने के बहाने वांगचुक को बलि का बकरा बना रही है।

24 सितंबर की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए गीता ने सुरक्षा बलों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और पूछा, “सीआरपीएफ को फायरिंग का आदेश किसने दिया?” उन्होंने कहा कि लद्दाख जैसे शांत क्षेत्र में, जहां कभी कोई हिंसक प्रदर्शन नहीं हुआ, वहां अपने ही नागरिकों पर गोली चलाना अस्वीकार्य है।

लद्दाख पुलिस के आरोपों को खारिज किया

आंगमो ने लद्दाख के पुलिस महानिदेशक एसडी सिंह जम्वाल के बयानों की भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने ANI से बातचीत में कहा, “हम लद्दाख डीजीपी के बयानों की कड़ी निंदा करते हैं। केवल मैं ही नहीं, बल्कि पूरा लद्दाख इन आरोपों को खारिज करता है।”

डीजीपी ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वांगचुक के पाकिस्तान से कथित संबंधों पर सवाल उठाए थे और उनके विदेश दौरों पर भी संदेह जताया था।

“सोनम वांगचुक को फंसाने की साजिश”

गीता आंगमो ने स्पष्ट किया कि उनके पति सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, और 24 सितंबर की घटना से उनका कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने बताया कि घटना के समय वांगचुक कहीं और भूख हड़ताल पर थे।

उन्होंने आरोप लगाया, “पुलिस किसी एजेंडे के तहत काम कर रही है। वे छठा शेड्यूल लागू नहीं करना चाहते और किसी को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं।”

‘राष्ट्रविरोधी’ कहे जाने पर भी दी सफाई

वांगचुक पर ‘राष्ट्रविरोधी’ टैग लगाए जाने को भी गीता आंगमो ने खारिज करते हुए कहा कि वह वर्षों से “गांधीवादी तरीकों” से शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 24 सितंबर की स्थिति CRPF की कार्रवाई के चलते बिगड़ी, न कि किसी उकसावे के कारण।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक की पाकिस्तान यात्रा जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित एक सम्मेलन के तहत हुई थी। उन्होंने कहा, “हम एक जलवायु सम्मेलन में गए थे। हिमालय की बर्फ यह नहीं देखती कि वह भारत में पिघल रही है या पाकिस्तान में।”

गीता आंगमो के इन बयानों ने लद्दाख में उभरते तनाव और वांगचुक की गिरफ्तारी पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर प्रशासन वांगचुक पर गंभीर आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थक और परिजन इसे एक राजनीतिक साजिश मान रहे हैं। आने वाले समय में इस मुद्दे पर लद्दाख और राष्ट्रीय राजनीति में और बहस छिड़ सकती है।

नेपाल में दो साल की बच्ची को जीवित देवी चुना गया, जानें क्या है ये परंपरा और क्यों बनाई जाती है जिंदा देवी

नेपाल में दो साल की बच्ची को जीवित देवी चुना गया, जानें क्या है ये परंपरा और क्यों बनाई जाती है जिंदा देवी
नेपाल में दो साल की बच्ची को जीवित देवी चुना गया, जानें क्या है ये परंपरा और क्यों बनाई जाती है जिंदा देवी

काठमांडू: नेपाल में कुमारी परंपरा के तहत दो साल आठ महीने की आर्या तारा शाक्य को नई ‘जीवित देवी’ चुना गया है। मंगलवार को एक पारंपरिक समारोह के तहत उन्होंने काठमांडू के कुमारी घर में विधिवत रूप से सिंहासन ग्रहण किया। यह ऐतिहासिक परंपरा नेपाल में सदियों से चली आ रही है, जिसमें एक कन्या को देवी तलेजू का मानव अवतार माना जाता है।

काठमांडू के तलेजू भवानी मंदिर के पुजारी उद्धव कर्माचार्य के अनुसार, शुभ मुहूर्त में सम्पन्न इस विशेष समारोह के दौरान आर्या तारा शाक्य को पारंपरिक विधियों के अनुसार कुमारी के रूप में स्थापित किया गया।

कौन बन सकती है कुमारी?

कुमारी का चयन शाक्य समुदाय की लड़कियों में से किया जाता है, जो बौद्ध पृष्ठभूमि से आती हैं। हालांकि, कुमारी को हिंदू देवी के रूप में पूजा जाता है। परंपरा के अनुसार, लड़की की उम्र कम होनी चाहिए, पहली माहवारी शुरू नहीं हुई होनी चाहिए, शरीर पर कोई घाव या खरोंच नहीं होनी चाहिए और उसमें निर्भीकता होनी चाहिए।

चयन प्रक्रिया बेहद कठिन होती है। इसमें बच्ची को एक अंधेरे कमरे में ले जाकर डरावने मुखौटे और भैंस के सिरों के बीच रखा जाता है। यदि वह बिना डरे बाहर निकल आती है, तो उसे देवी के रूप में स्वीकार किया जाता है।

पूर्व कुमारी को किया गया पदमुक्त

इससे पहले की कुमारी को हाल ही में 12 वर्ष की आयु में पहली माहवारी आने के बाद पदमुक्त किया गया। कुमारी के रूप में चुनी गई कन्या तब तक देवी मानी जाती है, जब तक कि उसे पहली बार माहवारी न हो जाए। इसके बाद उसे ‘सामान्य जीवन’ में वापस लौटाया जाता है।

सदियों पुरानी परंपरा

नेपाल में कुमारी पूजा की परंपरा 500 से 600 साल पुरानी है और यह मल्ल राजवंश के समय से चली आ रही है। इस परंपरा के तहत कुमारी को देवी तलेजू भवानी का अवतार माना जाता है और उनका पूजन हिंदू और बौद्ध, दोनों समुदायों द्वारा किया जाता है।

नेपाल के राष्ट्रपति और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारी इंद्रजात्रा जैसे पर्वों में कुमारी का आशीर्वाद लेते हैं। यह परंपरा आज भी नेपाली सांस्कृतिक पहचान का एक गहरा हिस्सा बनी हुई है।

नई कुमारी आर्या तारा शाक्य का चयन न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि यह परंपरा आज भी नेपाल की सामाजिक और आध्यात्मिक संरचना में जीवंत बनी हुई है। इतनी कम उम्र की बच्ची का देवी रूप में प्रतिष्ठित होना इस परंपरा की अनोखी विशेषता को दर्शाता है।

Asia Cup 2025 Trophy विवाद में नया मोड़, भारत ने जताई नाराज़गी, UAE क्रिकेट बोर्ड को सौंपी गई ट्रॉफी

Asia Cup 2025 Trophy विवाद में नया मोड़, भारत ने जताई नाराज़गी, UAE क्रिकेट बोर्ड को सौंपी गई ट्रॉफी
Asia Cup 2025 Trophy विवाद में नया मोड़, भारत ने जताई नाराज़गी, UAE क्रिकेट बोर्ड को सौंपी गई ट्रॉफी

नई दिल्ली: एशिया कप 2025 के फाइनल में भारत की पाकिस्तान पर शानदार जीत के बाद ट्रॉफी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब और गंभीर होता जा रहा है। एशियाई क्रिकेट परिषद (ACC) के अध्यक्ष और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के चेयरमैन मोसिन नक़वी द्वारा ट्रॉफी को आयोजन स्थल से अपने साथ ले जाने पर भारत ने कड़ा ऐतराज़ जताया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब नक़वी ने यह ट्रॉफी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) क्रिकेट बोर्ड को सौंप दी है। यह कदम एसीसी की 30 सितंबर को हुई वर्चुअल बैठक के बाद उठाया गया, जिसमें भारत की ओर से राजीव शुक्ला और आशीष शेलार ने हिस्सा लिया था।

भारत ने बैठक में उठाए तीन बड़े मुद्दे

BCCI प्रतिनिधियों ने वर्चुअल मीटिंग में तीन अहम मुद्दों को उठाया:

  1. मोसिन नक़वी द्वारा भारत को जीत की बधाई न देना।
  2. भारत के जीतने के बावजूद ट्रॉफी और मेडल्स को आयोजन स्थल से अपने साथ ले जाना।
  3. ट्रॉफी को ACC मुख्यालय दुबई में रखने की भारत की मांग की अनदेखी।

BCCI अधिकारियों ने साफ किया कि उन्होंने जानबूझकर नक़वी से ट्रॉफी स्वीकार करने से इनकार किया, क्योंकि वह पाकिस्तान के एक वरिष्ठ मंत्री भी हैं।

BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने इस फैसले को “सोचा-समझा और ठोस निर्णय” बताया। उन्होंने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अस्पोर्ट्समैनशिप वाला व्यवहार है। ट्रॉफी और मेडल्स को आयोजन स्थल से ले जाना किसी भी मानदंड के अनुसार स्वीकार्य नहीं है।”

ICC में दर्ज कराई जाएगी शिकायत

सैकिया ने आगे कहा कि भारत इस मामले को नवंबर में दुबई में होने वाली आईसीसी कॉन्फ्रेंस में भी उठाएगा। “हम आईसीसी में इस व्यवहार के खिलाफ एक गंभीर और औपचारिक विरोध दर्ज कराने जा रहे हैं,” उन्होंने कहा।

अब क्या?

फिलहाल ट्रॉफी UAE क्रिकेट बोर्ड को सौंप दी गई है, लेकिन भारत की मांग है कि ट्रॉफी और मेडल्स जल्द से जल्द भारतीय टीम को सौंपे जाएं। बैठक के दौरान मोसिन नक़वी ने इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और चुप्पी साधे रखी, जिससे भारत की नाराज़गी और भी बढ़ गई है।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारत-पाकिस्तान क्रिकेट संबंध पहले से ही संवेदनशील मोड़ पर हैं। ऐसे में ACC चेयरमैन की भूमिका और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

एशिया कप जीत के बाद यह विवाद भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों और बोर्ड के लिए अप्रत्याशित और अपमानजनक रहा है। अब निगाहें नवंबर में होने वाली ICC बैठक पर हैं, जहां भारत इस मामले को वैश्विक मंच पर ले जाकर ACC अध्यक्ष की ज़िम्मेदारियों पर सवाल खड़ा कर सकता है। यह मामला सिर्फ एक ट्रॉफी का नहीं, बल्कि खेल भावना और अंतरराष्ट्रीय खेल संचालन के मूल्यों का भी है।

Neeraj Ghaywan की फिल्म ‘Homebound’ क्यों गई ऑस्कार में, फिल्मी समझ वाले ही इस फिल्म को देंखे

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नई दिल्ली: मशहूर निर्देशक नीरज घेवान ने लगभग एक दशक बाद अपनी नई फिल्म ‘होमबाउंड’ के ज़रिए हिंदी सिनेमा में एक बार फिर वापसी की है। 2015 में आई फिल्म मसान से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले नीरज ने ‘अजीब दास्तान्स’ की गीली पुच्ची जैसी यादगार कहानी के बाद कुछ वर्षों तक पर्दे से दूरी बनाए रखी। लेकिन इस बार उन्होंने जो सिनेमा रचा है, वह न सिर्फ एक फिल्म है, बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक दस्तावेज़ है—एक ऐसा बयान जिसे देखना हर दर्शक और हर नागरिक की जिम्मेदारी बनती है।

तीन किरदार, तीन संघर्ष

‘होमबाउंड’ की कहानी चंदन, शोएब और सुधा के इर्द-गिर्द घूमती है। ये तीनों किरदार उस समाज की तस्वीर सामने लाते हैं, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। चंदन एक दलित है, शोएब मुस्लिम, और दोनों अपनी पहचान से छुटकारा पाने की जद्दोजहद में हैं। दोनों मानते हैं कि वर्दी उन्हें वह सम्मान और सुरक्षा दे सकती है, जो उनकी जाति और मजहब नहीं दे पाए। फिल्म में एक मार्मिक दृश्य आता है, जब चंदन जनरल कैटेगरी से पुलिस भर्ती का फॉर्म भरता है और कहता है, “सही नाम लिखता हूं तो दूसरों से दूर हो जाता हूं, झूठा नाम लिखता हूं तो ख़ुद से दूर हो जाता हूं।”

यह संवाद ही नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का मानसिक संघर्ष है जिसे नीरज घेवान ने बेहद संजीदगी से फिल्माया है।

कोविड महामारी की सबसे जरूरी झलक

‘होमबाउंड’ सिर्फ सामाजिक पहचान की बात नहीं करती, यह फिल्म कोविड महामारी के उस भुला दिए गए दौर को भी दोबारा जीने पर मजबूर करती है, जिसे दुनिया ने मानो जान-बूझकर भुला दिया। फिल्म आपको श्मशान के बीचोंबीच खड़ा कर देती है, जहां एक नहीं, अनगिनत लाशें जल रही हैं। यह महामारी की त्रासदी पर सिर्फ अफसोस नहीं जताती, बल्कि उस स्मृति को संरक्षित भी करती है जिसे इतिहास और सिनेमा दोनों ने अब तक गंभीरता से नहीं संभाला।

नीरज घेवान की यह कोशिश न सिर्फ साहसी है, बल्कि यह हिंदी सिनेमा की ओर से महामारी पर एक तरह की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी की पूर्ति भी है।

अभिनय की नई ऊंचाइयों तक पहुंचे कलाकार

ईशान खट्टर और विशाल जेठवा ने अपने किरदारों को जिस गहराई से जिया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। ईशान पहले भी अपनी प्रतिभा से प्रभावित कर चुके हैं, लेकिन विशाल जेठवा का प्रदर्शन इस बार उन्हें एक नई लीग में पहुंचा देता है। निर्देशक अब उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। वहीं जाह्नवी कपूर ने सुधा के किरदार में अपने करियर का सबसे दमदार और परिपक्व अभिनय प्रस्तुत किया है। उनकी मौजूदगी फिल्म को एक गहरी मानवीय संवेदना से भर देती है।

सिनेमा जो सिर्फ दिखाता नहीं, जगाता है

‘होमबाउंड’ वह फिल्म है जो थिएटर से निकलते समय दर्शक की जेब में कोई न कोई सवाल ज़रूर रख देती है। यह फिल्म बताती है कि सिनेमा का काम सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि याद दिलाना भी है याद दिलाना कि हम क्या थे, और अब क्या बन गए हैं। यह फिल्म सिखाती है कि उम्मीद अभी बाकी है, लेकिन आंखें खुली रखना जरूरी है।

‘होमबाउंड’ नीरज घेवान की एक ऐसी वापसी है जो सिर्फ फिल्मी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक घटना बन चुकी है। यह फिल्म उन कहानियों को आवाज देती है जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे देखे बिना इस दौर को समझना अधूरा रहेगा।

हिंदी सिनेमा को ऐसी फिल्मों की आज सबसे ज्यादा जरूरत है और ‘होमबाउंड’ इस जरूरत का एक शुद्ध, सशक्त और साहसी उत्तर है।